टीवी कलाकार प्रत्युषा बनर्जी की मौत और भारतीय मीडिया पर कवरेज

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निलेश पुरोहित

कल शाम जैसे टेलीविजन अभिनेत्री प्रत्यूषा बनर्जी के मौत की खबर आई तब से देश के सभी मिडिया चैनल, समाचार पत्रों और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स में उसी को लेकर चर्चा चल रही हैं, मौत पर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, अतिउत्साह में मिडिया के कुछ साथी इस बात पर विशेष चिंतन कर रहे हैं कि फांसी कैसे और किस तरह लगाई गयी.

मुझे नहीं पता की अत्म्हत्या के केस में जिस में अभी तक वह यह भी साबित नहीं हुआ की वह आत्महत्या ही थी, पर जर्नलिज्म के क्या एथिक्स हैं ?

क्या किसी कि मौत पर उसके तरीके का इतना गहन अध्ययन देश के करोड़ों टेलीविजन स्क्रीन्स पर दिखाया जाना चाहिए या नहीं?? इस तरह की जर्नालिस्म से समाज को क्या फायदे हैं क्या नुकसान हैं, मुझे लगता हैं इसपर भी विचार किया जाना चाहिए.

खैर दुनिया छोड़ कर जाने वाली अभिनेत्री प्रत्यूषा पर मिडिया की इतनी पैनी नज़र होने इसलिए भी हैं क्योंकि वह देश के हर हर घर में किसी समय रात 8 बजे से 8:30 बजे राज करने वालों में से एक रही हैं, उसका इस तरह से जाना निसंदेह प्रशंसकों के लिए एक भावनात्मक अघात ही हैं.

टीवी कलाकार का इस तरह से संदिग्ध परिस्थितियों में खुदखुशी करना कोई नया नहीं हैं, मुझे इससे पहले फिल्म अभिनेत्री जिया खान का केस याद आता हैं, इसलिए क्योंकि प्रत्यूषा और जिया खान दोनों बेहद महत्वाकांक्षा रखने वाली लड़कियां रही हैं, दोनों के केस में उनकी मौत का असली कारण निजी जीवन में प्रेम प्रसंग में परेशानियाँ रही हैं, (जितना अभी तक स्पष्ट हो पाया हैं), दोनों लड़कियों में कला कूट कूट कर भरी थी, फर्क था कि एक ने अपनी पहचान छोटे पर्दे पर भारतीय संस्कृति से लबरेज़ बहु के रूप में बनायीं वहीँ दूसरी ने बड़े पर्दे पर एक बोल्ड बिंदास बाला की छवि बनायीं.

आज के भागते हुए समय में ऐसी घटनाएं आपको विचलित कर सकती हैं विशेषकर अगर आप उस व्यक्ति विशेष के समर्थक या फ़ोलोवर रहे हों, लेकिन ऐसे कई सवाल हैं जो इस विचलता के तले दब जाते हैं, कई तथ्य हैं जिसपर हमारा आपका ध्यान नहीं जा रहा हैं.

विज्ञान के अंग भौतिकी में कहा जाता हैं की कोई भी घटना या दुर्घटना अचानक नहीं होती, वह सदैव छोटी छोटी प्रसंगों के चैन में आगे बढ़कर विशाल या भयावाह रूप ले लेती हैं, सवाल सिर्फ प्रत्यूषा जैसी लड़कियों का नहीं हैं, दो दिन पूर्व ही दिल्ली में एक मॉडल एवं इवेंट मैनेजर ने भी आपनी जान दे दी, देश में हर रोज़ कंही न कंही से आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं लेकिन हर मौत न्यूज़पेपर और टीवी चैनल की प्लेट पर हेडलाइन नहीं बनती,

आखिर क्या वजह हैं कि देश में लोग आतंरिक रूप से इतने कमज़ोर होते जा रहे हैं, क्या वजह हैं की आजकल थोडा सा भी दबाव या तनाव लड़कियों को खुदखुशी के रास्ते पर ले जाता हैं ?

वह कौनसी ऐसी छोटी छोटी सोच हैं जिसके साथ चलकर हम मानसिक रूप से इतने असहिष्णु हो गए की हार या कमी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे ?

अगर हम एक सामान्य मानसिक आकलन करेंगे तो पाएंगे कि देश में बढ़ रही आत्महत्या की घटनाओं के पीछे हमारी सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था ही जिम्मेदार हैं, उदाहरण के लिए आज के दौर में अगर किसी लड़की की शादी टूट जाए, या उसके प्रेम प्रसंग में असफलता हाथ लगे तो वह अपनी जान देने के लिए विचार करने लगती हैं, इस विचार के लिए हमारी सामाजिक व्यवस्था जिम्मेदार नहीं हैं लेकिन उसकी जिम्मेदारी ज़रूर बनती हैं कि ऐसा माहौल कायम किया जाए जिसमे किसी भी परिस्थिति में कोई भी व्यक्ति स्वयं को वेग से पृथक महसूस नहीं करें.

हो सकता हैं मेरी यह सोच आपको पूरी तरह से समझ में नहीं आये लेकिन इसमें यही संदेश छिपा हैं की सामाजिक व्यवस्था और माहौल अब दिनों दिन बेहद विषम होता जा रहा हैं, मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि हमारे समाज में वैचारिक रूप से अब “जान के बदले, शान ज्यादा प्यारी हो गयी हैं” हमारे लिए किसी भी कीमत पर शान से जीना ज़रूरी सा हो गया हैं, भले उसको पाने का तरीका उचित न हो, अगर वह कोशिश नाकाम हो जाये तो हम अपनी जान देकर रेस बाहर हो जाते हैं.

यह सोच किसी कम्यूटर वायरस की तरह ही हैं जिसमे व्यक्ति (यूज़र) कई बार वायरस (गलत सोच) को लेकर सीरियस नहीं होता, एवं दिन उसी वायरस (गलत सोच) की वजह से व्यक्ति (यूज़र) को नुकसान झेलना पड़ता हैं, और जैसे की मैंने कहा विषम परिस्थितिओं में यूज़र की हार्डडिस्क (जीवन) क्रेश कर जाते हैं.

आज की पीढी से हम अगर ऐसे मसलों पर बात करेंगे तो बड़े स्तर पर एक ही तरह की विचारशैली निकलकर सामने आएगी, किसी भी तरह पैसा कमाओ, अपने साथ एक पार्टनर ज़रूर रखो, जमकर मौज मस्ती करो, जितना कमाओ उसको खूब खर्च करो, हर कोई सेटल होने की दौड़ में लगा हैं जो सेटल हैं वही सक्सेफुल हैं, नहीं तो वह अन सक्सेसफुल माना जाएगा.

मैं आज जानना चाहता हूँ की यह सोच किसने पैदा की, किस आधार पर की ?

आपको जानकर हैरानी होगी की आज जो बच्चे चार्टड अकाउंटेंट, डॉक्टरी, इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे है उन सभी का अंतिम छोर पर एक ही लक्षय होने लगा हैं, मैं सभी की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि 100 में 97 % प्रतिशत बच्चों का यही सोचना हैं, की हमें अच्छी डिग्री हासिल करनी हैं, जिससे हमें अच्छी नौकरी मिल सके, जिससे हमें मनपसंद छोकरी या छोकरा लाईफ पार्टनर के रूप में मिल सके.

यह बात आप भी कई बार सोचते होंगे और हो सकता हैं की आपको लगता हों की यह सब सही हो रहा हैं, जबकि यह सही नहीं हो रहा हैं.

ज़रा ठन्डे दिमाग से सोचिये कि हम अपने जीवन के लक्ष्य को किस और ले जा रहे हैं ?

आज बड़े स्तर पर सामाजिक रूप से एक विचार हम सभी में जडें जमाये बैठा हैं कि “जो उस सामाजिक और आर्थिक लक्ष्य को हासिल कर लेगा जिसे खुद समाज ने स्थापित किया हैं वही एक सफलतम शख्सियत कहलायेगा. ”

आज हम सभी उस लक्ष्य की और भाग रहे हैं जिसको हमने ही सेट किया हैं, बस उसका आकार प्रकार पूर्व नियोजित ढर्रे पर होता हैं.

मेरी नज़र में हमारे सभ्य समाज कि वह मौजूदा व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यही हैं कि एक स्टूडेंट परीक्षा में कम नंबर आने के बाद अपनी जान दे देता हैं,

मैं उस सोच का आज खुलकर विरोध करना चाहता हूँ जिसमे उस लड़की के सम्मान को सिर्फ इसलिए कम माना जाता हैं क्योंकि उसकी शादी न हो पायी हों,
या उसका पिता आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम नहीं हों……

मैं कड़े शब्दों में मानसिक असहनशीलता का विरोध करने के लिए आह्वान करता हूँ जिसे झेल नहीं पाने के कारण हमारे लोग अपनी जान दे रहे हैं……

अपने शब्दों को विराम देने के लिए मैं अंत में यही कहूँगा कि आज के हालात सवाल उठा रहे हैं कि इंसान की “जान बड़ी या उसकी शान” ?

हमारे जीवन में सभी तरह के परेशानियों का हल हम स्वयं निकाल सकते हैं, बस अपनी सोच को बदलना हैं, जब सोच बदलेगी तब समाज भी बदलेगा, और जिस दिन समाज बदल जाएगा उस दिन किसी छात्र को कम नंबरों के लिए जान नहीं देनी पड़ेगी, या किसी प्रत्यूषा या जिया को अकेलेपन के गम में दुनिया को अलविदा नहीं कहना पड़ेगा.

Neelesh Purohit is a Rajasthan-based blogger. Views expressed here are the author’s own and jantakareporter doesn’t necessarily subscribe to them.

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