रवीश कुमार, राजकमल झा और अक्षय मुकुल: आपने दिखाया कि पत्रकारिता में धार अभी बाकी है !

0

जब सत्ता सवालों से कन्नी काटने लगे। जब सत्ता जनसरोकारों से मुंह फेरने लगे। जब सत्ता मीडिया की आजादी का गला घोंटने पर उतर आए। तो लोकतंत्र की लाज बचाने की खातिर ऐसी सत्ता का विरोध जरूरी हो जाता है। सत्ता को आईना दिखाना जरूरी हो जाता है। नवंबर 2016 के पहले हफ्ते में कुछ ऐसा ही कर दिखाया है रवीश कुमार, राजकमल झा और अक्षय मुकुल ने।

रवीश
Photo: Janta Ka Reporter
बीते जनवरी महीने में हुए पठानकोट आतंकवादी हमले के दौरान ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ को खतरे में डालने वाली रिपोर्टिंग के आरोप में मोदी सरकार ने पिछले दिनों NDTV इंडिया को एक दिन के लिए अपना प्रसारण रोकने का फरमान जारी किया। लोकतंत्र के प्रति जागरूक तबके में सरकार के इस आदेश को मीडिया की आजादी पर सीधा हमला माना जा रहा है।
सरकार के इसी आदेश के खिलाफ रवीश ने 4 नवंबर की रात अपने लोकप्रिय शो प्राइमटाइम में दो ‘माइम’ यानी मूक अभिनय करने कलाकारों को पैनलिस्ट के तौर पर बिठाया और व्यंग्य के जरिए इस सेंसरशिप का विरोध किया। इन दोनों ‘माइम’ में से एक “अथॉरिटी” जबकि दूसरा “ट्रोल” रहता है। ट्रोल की पहचान सोशल मीडिया पर अपने ‘आका’ के आलोचकों से गाली-गलौच और बदतमीजी से है। इतना ही नहीं, अथॉरिटी से पूछे गए सवालों के जवाब देने के लिए ट्रोल ही कूद पडता है।
अपने इस शो में व्यंग्य के जरिए रवीश ने दिखाया कि भारत में सत्ता-सुख भोग रहे लोग कैसे खुद को सवालों और जवाबदेही से परे समझने लगे हैं। जब-जब उनसे तीखे सवाल किए जाते हैं, वो भडक उठते हैं। लेकिन जब उन्हें भाने वाले सवाल पूछे जाते हैं, तो वो चहक उठते हैं। तभी तो शो के दौरान रवीश सवाल करते हैं – सर, बागों में बहार है ? और अथॉरिटी इस सवाल पर ‘शराफत’ से मुस्कुरा देता है।
रवीश ने ये शो ऐसे वक्त में दिखाया जब दो दिन पहले ही टाइम्स आॅफ इंडिया के पत्रकार अक्षय मुकुल ने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतिष्ठित माने जाने वाले रामनाथ गोयनका अवॉर्ड समारोह का बहिष्कार किया, क्योंकि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों से अवॉर्ड नहीं लेना चाहते थे। मुकुल ने अपने इस कदम पर कहा कि वो कैमरे की एक ही फ्रेम में खुद को मोदी के साथ नहीं देख सकते।
दिलचस्प ये भी है कि रामनाथ गोयनका अवॉर्ड समारोह के दौरान ही इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर राजकमल झा ने प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में उन्हें पत्रकारिता के कुछ कडवे सबक दे दिए। दरअसल, मोदी ने इसी समारोह में अपने संबोधन के दौरान पत्रकारों को आपातकाल की याद दिलाते हुए कहा था कि उस दौर के बारे में मंथन करते रहना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसा पाप दोबारा करने वाला कोई नेता पैदा न हो।
राजकमल ने समारोह के समापन भाषण में कहा कि आज ‘रीट्वीट’ और ‘लाइक’ के जमाने में जवान हो रहे पत्रकारों को पता ही नहीं है कि सरकार की तरफ से की गई आलोचना उनके लिए इज्जत की बात है। प्रधानमंत्री की ओर से की गई मीडिया की तारीफ पर राजकमल ने एक वाकया याद दिलाते हुए कहा कि जब एक राज्य के मुख्यमंत्री ने रामनाथ गोयनका से कहा कि आपका रिपोर्टर अच्छा काम कर रहा है तो गोयनका साहब ने उस रिपोर्टर को नौकरी से ही निकाल दिया। उन्होंने ये भी कहा कि आज अच्छी पत्रकारिता मर नहीं रही, बल्कि बेहतर हो रही है। हालांकि, ये जरूर है कि बुरी पत्रकारिता कुछ ज्यादा ही शोर मचा रही है।
बहरहाल, कुछ लोग दलील दे रहे हैं कि हार्डकोर न्यूज के बजाय माइम के जरिए सरकार को घेरने का रवीश का तरीका ठीक नहीं था। लेकिन ये भी सच है कि मौजूदा सरकार के कई मंत्री बार-बार ये नसीहत देते हैं कि प्रधानमंत्री पर सवाल उठाना ठीक नहीं, सेना पर सवाल उठाना सही नहीं, पुलिस पर सवाल उठाना ठीक नहीं वगैरह-वगैरह।
सोशल मीडिया पर ट्रोल कैसे उत्पात मचाते हैं, क्या ये फेसबुक या ट्विटर इस्तेमाल करने वालों से छुपा है ? पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वालों के अलावा भी एक तबका है, जिसे ट्रोल्स की हरकतों के बारे में बताना जरूरी था । ऐसे में ट्रोल की पोल खोल कर रवीश ने कुछ गलत किया ?
जहां तक हार्डकोर न्यूज के जरिए सरकार को घेरने की बात है, तो प्राइमटाइम के पहले ब्रेक के बाद रवीश ने ये रिपोर्ट भी दिखाई कि आटे की कीमत में कितनी बढोत्तरी हुई है। सुबह-शाम हमारी रसोई में काम आने वाले आटे की कीमत में अचानक 30 फीसदी तक की उछाल आ जाना बडी खबर नहीं है ?
राजकमल ने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में जो कहा, वो काबिल-ए-तारीफ है। ज्यादातर लोग अपने घरों और दफ्तरों में बैठकर सरकार को कोसते हैं, लेकिन राजकमल ने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में एक संदेश देने की कोशिश की।
अक्षय मुकुल का कदम भी दमदार प्रतिरोध को जाहिर करता है। उन्होंने अवॉर्ड समारोह के बहिष्कार के फैसले से संदेश दिया कि कथनी और करनी में फर्क नहीं होना चाहिए। ये नहीं होना चाहिए कि आप दिन-रात किसी नेता को पानी पी-पीकर कोसें और फिर एक दिन उसी के हाथों से अवॉर्ड लेने चले जाएं। आखिर आत्मसम्मान नाम की भी कोई चीज होती है।
बहरहाल, रवीश, राजकमल और अक्षय ने साबित कर दिया है कि आज भले ही ‘सेल्फी पत्रकारों’ की एक बडी जमात उभरकर आ गई है, लेकिन सत्ता के नशे में चूर नेताओं और अफसरों को अपने सवालों से असहज करने वाले पत्रकार अब भी मौजूद हैं। जी-हुजूरी को ठेंगा दिखाने वाले पत्रकार अब भी मौजूद है।
रवीश का 4 नवंबर 2016 वाला प्राइमटाइम शो और राजकमल का संबोधन हर युवा पत्रकार को देखना चाहिए, ताकि उन्हें अपनी और सवालों की अहमियत समझ आ सके। पत्रकारिता की पढाई कराने वाले संस्थानों में भी इन्हें दिखाया जाना चाहिए, ताकि पत्रकारों की अगली पीढी में धार कायम रहे।
( लेखक युवा पत्रकार हैं )   

Also Read:  "In Modi's India, opposition CM is taken prisoner by his cops if he tries to console a resident in his own state"

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here