कन्हैया कुमार के समय JNU के कॉन्डोम गिनने वाली खबर तक को खबर बनाने वाले न्यूज चैनल्स नजीब की गुमशुदगी पर बिल्कुल खामोश है

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पिछले काफी समय से लगभग सभी न्यूज चैनल्स पर दो तरह की चीजे आम बात हो गई है। एक वो चीज जो शायद नही दिखाई जानी चाहिए थी मगर फिर भी दिखाई गई और दूसरी वो चीज जिसे दिखाना पत्रकारिता का कर्तव्य है।

पर कहीं ना कहीं उसे दिखाने मे कोताही बरती गई, देश मे घटित विगत कई घटनाओं और उन घटनाओं का न्यूज चैनल्स पर जगह ना मिल पाना और कई घटनाओं का न्यूज चैनलों पर कुछ ज्यादा जगह पा जाना मन मे कई सवालों को जन्म देता है।

न्यूज चैनल्स

मसलन शीना वोरा मर्डर मिस्ट्री जैसी खबरे जो खूब चटखारे लेकर बनाई गई और परोसी गई जिसका शायद ही आम जनमानस से कोई सरोकार रहा हो, खूब चलाई और दिखाई गई।

इसके विपरीत गुजरात दलित पिटाई कांड और उसके बाद का दलित आंदोलन और कुछ दूसरी खबरे जो साल भर प्राईम टाईम मे जगह पाने को तरसती रही जिन खबरों का हक था की वो खबरिया कार्यक्रमो मे जगह पाती आम जनमानस का एक आंदोलन बनती पत्रकारिता का सही हक अदा करती लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को और ज्यादा मजबूत करती, ऐसी खबरे कोई खास तवज्जो नही पा सकी।

झारखंड के मिन्हाज़ अंसारी की वाॅट्सएप पर आपत्तिजनक पोस्ट और उसके बाद पुलिस हिरासत मे उसकी मौत जो कई सारे सवाल खड़े कर गई ये खबर राष्ट्रीय स्तर पर खबर बनने लायक थी पर अफसोस नही बन सकी, शायद चैनल्स की इस खबर मे दिलचस्पी इसलिए ना रही हो, क्योंकि ना तो ये घटना उत्तर प्रदेश और बिहार की थी और ना ही वहाँ गैर भाजपा सरकार थी। और ना ही वहाँ आगामी दिनों मे चुनाव होने वाले है, वरना मुमकिन था जंगलराज नाम से एकाध ऐपिसोड तो बन ही जाता।

न्यूज चैनल्स JNU से पिछले 13 दिनों से लापता छात्र नजीब अहमद की गुमशुदगी मे कोई दिलचस्पी क्यों नही दिखा रहे हैं? एक माँ है जो पिछले 13 दिनों से अपने बेटे को खोजने दरबदर की ठोकरें खा रही है, अपनी आँखों मे अश्को का दरिया समेटे अपने जिगर के टुकड़े को तलाश रही है पर ना जाने क्यों JNU के कन्हैया कुमार के मामले के उलट न्यूज चैनल्स JNU के नजीब अहमद पर एकदम मौन धारण किए हुए है।

कन्हैया कुमार के समय JNU के कॉन्डोम गिनने वाली खबर तक को खबर बनाने वाले चैनल्स नजीब की गुमशुदगी पर बिल्कुल खामोश है आम आदमी की विधायको की गिरफ्तारी पर दिल्ली पुलिस की तत्परता का पल पल का कवरेज दिखाने वाला मीडिया, दिल्ली पुलिस की इस नाकामी पर खामोश क्यों है ये बात समझ से परे है।

अभी चार दिन पहले ही प्रधानमंत्री जी के उस भाषण जिसमे उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को उनका हक दिलाने की बात कही थी को सुर्खियाँ बनाने वाले चैनल्स नजीब की माँ (ऐक मुस्लिम महिला) को उसकी ममता का हक दिलाने का सवाल प्रधान मंत्री जी से क्यों नही पूछ रहे है?।

प्राईम टाईम पर नजीब की गुमशुदगी पर बहस क्यों नही कराई जा रही है, क्या दिल्ली के ऐक बहुचर्चित विश्वविद्यालय की ये घटना इतनी मामूली है की उसे चैनल्स पर जगह ना मिल सके? क्या नजीब की माँ के आँसुओं से दिल्ली का दिल नही पसीजा, क्या अपने बेटे की विरह वेदना मे तड़पती ऐक माँ का दर्द आपके चैनल्स मे जगह पाने लायक नही है?

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