सियासी खेलकूद के लिए मुस्लिम लीडर पार्टियों का खिलौना बनकर रह गये है

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तीन अहम घटनाएं अभी मुख्य रूप से हमारे सामने आई पहले अखलाक अहमद के कातिल की लाश पर तिरंगा और भारी भरकम मुआवजे का ऐलान उसके बाद वाट्स्एप पर बीफ को लेकर किए गये पोस्ट के बाद मिनहाज अंसारी की गिरफ्तारी और संदिग्ध परिस्थितियों मे मौत। और तीसरे JNU के छात्र नजीब की संदेहास्पद गुमशूदगी।
Photo: Indian Express
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हाल फिलहाल के मुसलमानों से जुड़े हुए तीन गंभीर मुद्दे। जिसका हिंदुस्तान के हर अमन पसंद इंसान ने अपने अपने स्तर पर विरोध किया। जिससे जैसा बन सका उसने उस तरह से विरोध किया, किसी ने सोशल मीडिया पर अपने गुस्से का इजहार किया तो किसी ने सड़क पर निकल पर प्रदर्शन किया तो किसी ने JNU कैंपस के अंदर अपना विरोध प्रदर्शन किया। जिससे जैसा बन सका उसने वैसे इन तीनों मुद्दों पर अपनी बात पूरी मजबूती से रखी। फिर भी इन सारे मुद्दों पर मैने ऐक चीज की कमी मेहसूस की है और काफी हद तक मुमकिन है कि वो कमी आप सबने भी मेहसूस की हो। और वो है मुस्लिम लीडरशिप की कमी।
तीन इतने बड़े मुद्दों की लड़ाई लड़ने के लिए कोई एक भी मुस्लिम सियासी लीडर खड़ा दिखाई नही दिया। यहाँ तक कि देश की सबसे बड़ी मुस्लिम सियासी पार्टी और देश के सबसे बड़े मुस्लिम लीडर (जैसा कि इस पार्टी के समर्थक दंभ भरते है) जो उत्तर प्रदेश मे पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ने को आतुर दिखाई दे रहे हैं। मुसलमानो से जुड़े हुए इन तीनो मुद्दो पर नाम मात्र का भी प्रदर्शन नही कर पाये। अक्सर अपने बयानों से सुर्खियां बटोरने वाले उस बड़ी पार्टी के नेता जी इन तीनों मुद्दों पर कोई ऐक ऐसा बयान तक नही दे पाये जो राष्ट्रीय स्तर की सुर्खी बनता, ना ही कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन। ना ही कोई जोशीला भाषण। क्या हम सिर्फ सियासी खेलकूद के लिए इन बड़े मुस्लिम लीडरों या पार्टियों का खिलौना बनकर रह गये है?
हमारी जरूरत के समय हमारे मुद्दों की लड़ाई के समय राष्ट्रीय स्तर पर हमारे किसी मुद्दे की रहनुमाई के लिए हम किसके पास जायें? हम किससे कहने जाये कि वो अख़लाक के कातिल की लाश पर तिरंगे और उसे उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार द्वारा दिए गए मुआवजे को कोर्ट मे चुनौती दे। हम मिनहाज अंसारी की विधवा और बच्चों को लेकर किसके पास जाये? कौन इस यतीम बच्चे के बाप के गुनहगारों को सजा दिलाऐगा? हम किसके पास जाये JNU छात्र नजीब की माँ को लेकर, कौन इस माँ के लख़ते जिगर को ढूंढने के लिए सरकार पर दबाव बनायेगा। हम आज भी ऐक अदद सियासी रहनुमा के लिए उम्मीद भरी निगाहों से कई चेहरो को देख रहे हैं मगर वो चेहरे है कि हमे वोटो के बंडल के अलावा कुछ समझने ही तैयार नही है। अफसोस सिर्फ अफसोस।

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