ऐ भारत माता बोल कि तेरे सीने पर दलितों आदिवासियों और मुसलामानों को जिंदा जलाने वाले देशद्रोही हैं

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काशिफ़ अहमद फ़राज़

छात्र राजनीति लोकतंत्र की पाठशाला है, इतिहास गवाह है कि कैंपस की राजनीति से निकले छात्रों ने देश की राजनीति में अहम योगदान दिया है और ऐसे समय जब राजनीति पारिवारिक राजशाही का गढ़ बन चुकी है.

ये छात्र नेता ऐसे राजनीतिज्ञों को अपने गले की हड्डी नज़र आने लगे, इसिलए कई विश्वविधालयों में छात्र संघ के चुनावों पर बैन लगाकर छात्र राजनीति को बंद करने की साज़िशें होती रही हैं.

जहाँ छात्र संघ पर बैन लगाने पर राजनितिक पार्टियों का बस नहीं चलता, वहां छात्र नेताओं पर झूठे आरोप लगाकर पुलिसिया कार्यवाही के ज़रिये दमन किया जाता है. स्कालरशिप को लेकर Occupy UGC के आंदोलन से लेकर दलित स्कॉलर रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के खिलाफ उठे आंदोलनों ने सरकार की जड़ें हिला दीं.

इन आंदोलनों से भौखलायी सरकार, छात्र आंदोलन से बदला लेने की घात में थी और अफज़ल गुरु की बरसी पर जेनयू में आयोजित कार्यक्रम, उनके लिए एक अच्छा मौका था जिसे भुनाने में उन्होंने कोई कसर नही छोड़ी.

लेकिन ये सोच कर ग़लती बैठे कि पुलिसिया कार्यवाही से जेएनयू के छात्र डर जाएंगे. छात्र नेता कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, आशुतोष कुमार, अनिरभान आदि की गिरफ्तारी छात्र आंदोलन दबा नहीं बल्कि इसे नया जोश मिला है..

जिसपर हफ़ीज़ मेरठी ने कहा था:

आबाद रहेंगे वीराने, शादाब रहेंगी ज़ंजीरें,
जब तक दीवाने ज़िंदा हैं, फूलेंगी-फैलेंगी ज़ंजीरें,
आज़ादी का दरवाज़ा भी अब खुद ही खोलेंगी ज़ंजीरें,
टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगी, जब हद से बढ़ेंगी ज़ंजीरें..

हैरत कि बात है जिस विचारधारा का देश एकता और अखंडता को बर्बाद करने में अहम योगदान रहा, आज वही राष्ट्रवादी और देशद्रोही होने के सर्टिफिकेट बाँट रहे हैं. बाबरी, कन्धमाल, गुजरात से लेकर मुज़फ्फरनगर तक दंगा और साम्प्रादायिक द्वेष फैलाने वाले आज सत्ता के गलियारों से उनसे बदला ले रहे हैं जिन्होंने इस नफरत की राजनीति के खिलाफ आवाज़ उठायी थी.

भारत के विरुद्ध और पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने वालों की तफ़्तीश किये बग़ैर छात्र संघ के अध्यक्ष और अन्य छात्रों को गिरफ्तार कर सरकार और पुलिस ने बेवकूफ़ी का सबूत दिया है.

यूट्यूब पे मौजूद वीडियो इस बात कि साफ़ निशानदेही कर रहे हैं कि नारे लगाने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य हैं मगर मीडिया और न पुलिस इस पहलू को जानबूझ कर नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. और बेहद अजीब से तर्क देकर मुद्दे को दूसरा रुख देने की कोशिश की जा रही है.

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पिछले तीन दिनों से देश के पूंजीपति और उनका मीडिया ताने दे रहा है कि टैक्स अदा करने वालों का पैसा जवाहरलाल नेहरु विश्विद्यालय के छात्र देश विरोधी कामों में बर्बाद कर रहे हैं, ये दलील खुली सामंती मानसिकता की परिचायक है जो ये चाहता है कि उनके टैक्स पर “पल बढ़” रहे छात्र उनके गुलाम बनकर सिर्फ वही बोले जो उन्हें पसंद हो और वहीँ करें जो उन्हें ठीक लगे!! एक लोकतान्त्रिक देश में ऐसी मानसिकता सिर्फ अमानवीय ही नहीं बल्कि अतार्किक भी है

क्या ये बताने की ज़रूरत है कि एक लाख चौदह हज़ार करोड़ रूपये का सरकारी बैंकों का क़र्ज़ माफ़ किया गया है जो जाहिर है देश के पूरे तालीमी बजट से बहुत ज्यादा है!! जिन टीवी चैनलों से चीख-चीख कर गरीब वर्ग के छात्र समुदायों को ये ताना दिया जा रहा है क्या वो ये पूछने की कोशिश करेंगे कि सरकारी बैंक में एक लाख चौदह हज़ार करोड़ रूपये किसके थे!! वैसे आपने ये किस हिसाब से जोड़ लिया की देश की शिक्षा आपके टैक्स की भीख पर चल रही है और आपकी उद्योग सिर्फ आपकी मेहनत की कमाई से चल रही है, आप देश को क्या दे रहे हैं और छात्र देश को क्या दे रहे हैं आप इन सवालों में जाने की कोशिश नहीं करेंगे

अगर सरकार जनता की, जनता के लिए जनता के द्वारा है तो देश के तमाम उद्योगपतियों को लाखों करोड़ों रूपये की सहुलतें, कौड़ियों के दाम पर जमीने दिए जाने की कवायद.

देश की जनता भी ये कहने का अधिकार रखती है कि मेरी सम्पति पर आपका उद्योग फलफूल रहा है उसका एक हिस्सा हमें भी मिलना चाहिए! कितने निजी अस्पतालों को ये कह कर जमीने दे गई हैं कि वो कुछ गरीबों का भी इलाज करेंगे, कुछ बड़े निजी विद्यालयों को और निजी विश्वविद्यालयों को भी सुविधाए और जमीने दी गई हैं ताकि वो आम जनता के लिए भी कुछ करें, कहना ज़रूरी नहीं है की वहां कौन फायदा उठा रहा है और कौन नही!

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क्या जेएनयू और अन्य विश्विद्यालय में पढने के लिए ये शर्त ज़रूरी है कि वे राजनितिक मुद्दों पर अपना मत, सही या गलत, नहीं रखेंगे, वे सरकारी नीतियों पर अपनी राय देने के जुर्म में देशद्रोही करार दे दिए जायेंगे, क्या हमारी शिक्षानिति में सविंधान में ये लिखा गया है कि स्कालरशिप पाने वाले छात्र का हर हाल में सरकारी नीतियों से सहमत होना आवश्यक है?

और सबसे बड़ी बात ये किसने और कैसे तय कर दिया की देश के विश्विद्यालय ख़ास तौर पर कथित रूप से देशद्रोही गतिविधियों का अड्डा करार दे दिए गए जेएनयू में सरकारी पैसे की बर्बादी और टैक्स देने वाले लोगों के पैसे का दुरूपयोग हो रहा है?

क्या किताबे पढना और किताबी बातों को अपने जीवन में परखना और उसकी बुनियाद पर देश और समाज से सवाल करना ये बेफायदा है? अगर हाँ तो फायदा किसमें है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपने राजनितिक हार जीत के लिए किसी भी हद को पार करने के का फैसला कर चुके हैं, फिर चाहे पूरे छात्र समाज को, हर सवाल करने वाले व्यक्ति को, हर किताब पढने वाले व्यक्ति को, खुले मन से सोचने समझने वाले इंसान को हमने देशद्रोही करार देना पड़े!

नफे और नुक्सान की निगाह से शिक्षा में पैसा लगाने वाले उद्योगपतियों के निजी शैक्षिक संस्थानों में सामाजिक और राजनितिक चिंतन कितना होता है ये बताने की ज़रूरत नहीं है लेकिन ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है किआज शिक्षा संस्थानों में खुली फिजा में विचार करने, बहस करने और अपने मत पर चिंतन को नफे और नुक्सान से देखा जा रह है, ये सोच कि देश के सारे लोग एक ही तरह से सोचें, एक ही तरह की विचारधारा के पाबंद हों, एक ही राजनितिक सोच के पैरोकार हो और अगर ऐसा ना हो तो ऐसे शैक्षिक संस्थानों पर ताले डाल दिए जाएँ, ये सोच फासीवादी सोच नहीं तो और क्या है!

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इसी विश्विद्यालय के छात्र नेतत्र्व ने आपातकाल में सड़कों पर लाठियां खायीं थी. यहीं के उठे संघर्ष ने देश में गरीब और पिछड़े वर्ग के अधिकारों की लड़ाई को सड़कों से किताबों तक और किताबों से संसद तक और संसद से निति निर्माण तक पहुंचाने में योगदान क्या है.

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जब देर रात तक किसी हॉस्टल में देश में गरीबी और अशिक्षा पर बहस हो रही होती है तो टैक्स का ताना देने वाले बहुत सारे लोग चैन की नींद ले रहे होते हैं. जब मजदूरों के हक़-हुकूक के लिए यहाँ के छात्र दूर दराज़ गाँव में दौरा करते हैं तो नफे-नुक्सान के चश्मे से देखने वाले लोगों के लिए ये एक बेकार काम लगता है.

उन सभी मीडिया कर्मियों को जो दहाड़-दहाड़ के इस विश्विद्यालय को देश-विरोधी गतिविधियों का अड्डा बता रहे हैं हैं उन्हें कुछ समय इस संस्थान में ज़रूर गुज़ारना चाहिए, उन्हें ज़रूर यहाँ की राजनीति को करीब से देखना चाहिए, और सच बात ये है कि ये देश इतना कमज़ोर नहीं है कि अफज़ल गुरु और याकूब मेनन की फांसी को गलत मानने और समझने मात्र से इसकी एकता और अखंडता भंग हो जायगी.

अगर भारत माता में बोलने की शक्ति होती तो आज सबसे पहले अपने स्वयम्भु भगवे राष्ट्रवादियों को धिक्कार लगाती जो उसकी एक अरब संतानों में से कुछ को देशद्रोही, कुछ को आतंकवादी, कुछ को दलित, कुछ को मुसलमान बनाकर ज़िन्दा जलाने, मारने, पीटने और जेलों में ठूंस कर सत्ता का खेल खेल हैं. अगर भारत एक माँ हैं तो उसकी एक अरब से ज्यादा औलादों में उस पर बराबर का अधिकार है. अगर कोई इस माँ के ऊपर अपनी पसंद और नापसंद थोपने का प्रयत्न करेगा तो हमें भी अपनी मादरे वतन की अस्मिता और उसकी आजादी करने का पूरा अधिकार है

ऐ माँ बोल कि तेरे सीने पर दलितों आदिवासियों और मुसलामानों को जिंदा जलाने वाले देशद्रोही हैं

बोल कि तेरी बच्चों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले ही तेरे गद्दार हैं

ऐ मादरे वतन तू बोल कि टीवी से चीख-चीख कर कन्हैया कुमार को जेल भेजने वाले तेरे अपराधी हैं

बोल कि रोहित वेमुला को मारने वाले तेरे अपराधी हैं

(काशिफ़ अहमद फ़राज़ एक मानवाधिकार-लीगल एक्टिविस्ट हैं और एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स (APCR) से जुड़े हुये हैं)

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