गुजरात में स्थानीय निकाय चुनाव में पटेल समुदाय के लोगों को वोट देने से रोकने की साज़िश

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भाविन देसाई

इस  बार  गुजरात के  स्थानीय  निकाय के चुनाव  अलग  माहोल में  हो रहे हैं,  पिछले  12  सालो से भाजपा विकास ओर हिन्दूत्व के सहारे  गुजरात में  चुनाव जीतती आ रही है, पर  इस बार के चुनावों में पाटिदार आरक्षण आंदोलन के  कारण भाजपा के विकास ओर  हिन्दूत्व के  मुद्दे की हवा निकल गई। पाटिदार भाजपा के  वफादार  मतदाता थे, गुजरात मे उनका वोट प्रतिशत 12% के आसपास है।  ये भाजपा के  लिए  बहोत  बडा  नुकसान  था। भाजपा इस नुकसान की  भरपाई किसी भी  तरह  नहीं  कर  पा  रही है ।

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इस लिये भाजपा ने सत्ता में बने रहने के लिए सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करने का अपना पुराना हथियार पाटिदार मतदाताओं पर आजमाया। चुनाव आयोग ने सभी प्रत्याशियों को आखरी मतदाता सूची दी थी। वही सूची प्रीसाइडिंग ऑफिसर के पास थी ।

लेकिन चुनाव के ठीक एक दिन पहले रात को प्रीसाइडीग ऑफिसर के पास जो सूची थी उस सूची में पटेल मतदारो के नाम पर लाल पेन से लकीर मार दी गई और डिलीट का सिक्का मार दिया गया। जब सुबह में पटेल मतदाता मत डालने के लिए गए तो प्रीसाइंडीग ऑफिसर ने अपने पास की सूची के हिसाब से किसी भी पटेल मतदार को मत नहीं डालने दिया।

जबकी उम्मीदवारो के प्रतिनीघीयो के पास जो सुची थी उसमे मतदाताओ के नाम शामिल थे। किसी भी नागरिक का नाम  मतदाता सूची में  जोडने ओर निकालने के लिए  ऐक निश्चित प्रक्रिया अपनाई जाती है।

चुनाव के  ठीक  पहेले  आखरी  मतदाता सूची  सार्वजनिक  की  जाती है, वह सुची सभी प्रत्याशियों को दी जाती है। आखरी  मतदाता सूची  प्रगट करने के बाद कोई नया मतदाता नही जुड सकता, लेकिन उसमें कमी हो सकती है और उसका मुख्य कारण मतदाता की म्रत्यु या उस मतदाता का उस चुनाव में न रहना हो सकता है।

इस  तरह  कमी  हुऐ मतदाता की एक अलग सुची बनती है, जो चुनाव के ठीक एक दिन पहले प्रीसाइंडीग अफसर को दी जाती है, इस  सुची के आधार पर प्रीसाइंडीग अफसर कमी हुऐ मतदार का नाम मुख्य मतदार सुची से निकाल देता है ताकि उस नाम पर कोइ फर्जी वोट  ना पड सके, और इस  तरह  नाम कमी  हुऐ मतदाताओं की संख्या बहुत कम होती है, मुश्किल से  ऐक बुथ पर  1 से 2 लेकिन  इस तकनीक का  गुजरात में  सत्तापक्ष  ने  काफी  बड  फायदा  उठाया।

इस विषय को अहमदाबाद  कलेक्टर ओर राज्य के  मुख्य चुनाव आयुक्त के संज्ञान में लाया गया पर उन्होंने  इस  विषय पर  तत्काल कोइ  कार्यवाही  नहीं की, लेकिन जब हो हल्ला बढा तो लोगों का गुस्सा ठंडा करने के लिए दोपहर 2 बजे के बाद मौखिक आदेश जारी किया गया कि जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में नहीं है वह  सभी मतदान कर सकेंगे,  पर चूँकि लिखित आदेश बुथ पर नही पहुंचाए गए , इसलिए  सभी  प्रीसाइंडीग अफसरो ने मौखिक आदेश  मानने से मना कर दिया, यानी जिन मतदाताओं के नाम पर डिलीट का सिक्का मार दिया गया  वह अपना मत नहीं डाल  पाए ।

जहीर है ये सब धांधिलयां सत्ताधारी भाजपा के इशारे पर हुई, और बडे अफसरों की सहमति के बिना इतने बडे पैमाने पर धांधली होना  संभव नहीं है। चुनाव आयोग ऐक स्वायत्त संस्था है,  निष्पक्ष  चुनाव  करना उसका दायित्व है, पर गुजरात चुनाव आयोग अपना दायित्व  निभाने  मे नाकाम  रहा ओर आयोग मे बडे पदों पर बैठे अफसरों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए संस्था की गरिमा को बहुत बड़ा नुक्सान पहुचाया है।

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