छदम् राष्ट्रवादियों का राष्ट्रगान के बहाने प्रताडि़त करना

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इरशाद अली 

राष्ट्रवाद के एजेण्डें को लागू करने के मामले में देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई सबसे आगे वाली कतार में शामिल है। पिछले कुछ समय में असहनशीलता का जो माहौल उभर कर सामने आया है, उसे पैदा करने में मुम्बई की एक बड़ी भुमिका सामने रही है।

चाहे बीफ के मामले को लेकर हवा बनाना हो या पाकिस्तान भेजने की मुहिम या दूसरों का मुंह काला करने की कवायद। इन सब मामलों में मुम्बई से उठी चिंगारियां ज्यादा दिखाई दी हैं।

अभी फिलहाल राष्ट्रवाद की मुहिम में एक कड़ी और जुड़ गयी है। मामला है सिनेमा हाल में फिल्म देखने गए एक मुस्लिम परिवार को जबरदस्ती राष्ट्रगान के लिये ना सिर्फ उठाना बल्कि धमकाना और गाली-गलौच करना।

ये सब एक ताजा वीडियों में सामने आया है। राष्ट्रगान हम सब के दिलों से जुड़ा हुआ भाव है। जिसे हम मौके-ब-मौके गाते है। गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस या ऐसे दूसरे किसी अवसर पर। हम सब की श्रद्धा राष्ट्रगान से जुड़ी हुई जिसके सम्मान में खड़ा हो जाना स्वभाविक है। इसमें किसी धर्म या सम्प्रदाय वाली कोई बात नहीं है ना ही कोई धर्म या सम्प्रदाय इसके लिये रोकता है और ना उसका इससे अपमान होता है।

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बल्कि इस तरह के अवसरों पर राष्ट्रगान के बजने पर खड़ा होना हमारी सामुहिक एकता के प्रदर्शन को भी दर्शाता है। लेकिन महाराष्ट्र सरकार की राष्ट्रगान के बहाने चली हुई राजनीति इससे समझ आ जाती है कि सरकार किस तरह के एजेण्डें को थोप रही है। सिनेमा हाॅल के अन्दर फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजाकर तुम क्या साबित करना चाहते हो।

सभी माॅल्स, शोपिंग सेन्टर्स, अस्पतालों, सरकारी कार्यालायों में प्रवेश से पहले राष्ट्रगान को अनिवार्य कर देना चाहिये। अगर आप इसके सम्मान में नहीं रूके या सम्मान का प्रदर्शन आपने नहीं किया तो आप राष्ट्रभक्त नहीं। और अगर आप राष्ट्रभक्त नहीं तो आपकों राष्ट्रभक्त कैसे बनाना है ये हमें अच्छी तरह से आता है।

आप दिये गए वीडियों में देखिए छदम् राष्ट्रवादी भक्त किस प्रकार से एक मुस्लिम फैमली को सिनेमाहाल में राष्ट्रवाद के नाम पर प्रताडि़त कर रहे है कि आखिर में उन लोगों को फिल्म देखें बिना वहां से जाना पड़ा। पीएम मोदी जी को कोई जा कर बता दे कि देश में असहनशीलता का माहौल कहीं नहीं है सब आजाद है कोई भी किसी प्रकार की जबरदस्ती किसी पर नहीं थोप रहा है।

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अब पीएम मोदी जी के नुमाइन्दें इस वीडियों को देखकर बोलें कि सब नकली है। सुप्रीम कोर्ट ने 1986 में इस तरह के एक मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रगान अनिवार्य रूप से किसी पर भी लागू नहीं होता है। यहां स्वेच्छा वाली बात है।

हमने पहले ही बताया ही राष्ट्रगान दिल से जुड़ा हुआ एक भाव है जिसके प्रति सम्मान व्यक्त करना हमारा दायित्व बनता है लेकिन राष्ट्रगान के पीछे राजनीति करने वालों की मंशा क्या है। इसे समझने के लिये अब हमें किसी चश्में की जरूरत नही है।

यहां मैं बिलकुल साफ़ शब्दों में कह दूँ कि इस मुस्लिम परिवार का राष्ट्रगान के समय खड़े ना होना ग़लत था । इस्लाम में कहीं नहीं कहा गया है कि राष्ट्रगान का आदर करना ग़लत है, लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आता है कि फिल्म देखने से पहले राष्ट्रगान बजाये जाने का औचित्य क्या है?

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क्या कोई मुझे यह समझा सकता है? आप सिनेमाघरों में आनंद केलिए जाते हैं, क़ानून की किस किताब में यह लिखा है कि आप जब तक राष्ट्रगान नहीं सुन लेते, रणबीर कपूर, प्रिंयका चोपड़ा और दीपिका पदुकोने जैसे कलाकारों के पर्फॉर्मन्स को नहीं देख सकते?

अगर राष्ट्रगान और मनोरंजन इंडस्ट्री का इतना ही मेल है तो फिर इन कलाकारों पर भी यह अनिवार्य होना चाहिए कि वह शूटिंग के दौरान भी जब तक राष्ट्रगान को सुन कर उसका आदर नहीं कर लेते उन्हें शूटिंग करने की इजाज़त नहीं होनी चाहिए.।

राष्ट्रगान का मज़ाक उड़ाने केलिए वह लोग ज़िम्मेदार नहीं हैं जो इसके बजाये जाने के समय खड़ा नहीं होते बल्कि वह नेता और सरकार है जो इस तरह से आम जनता पर इसे थोपते हैं ! हमारे राजनेताओं को इस थोपने की बीमारी से बाज़ आना चाहिए।

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