दिल्ली में आपातकाल, सांस्कृतिक कार्यक्रम से सिर्फ इसलिए गिरिफ्तार क्यूंकि वह लड़के JNU जैसे लगते थे

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कपिल शर्मा 

और इस बीच……
आज की कुछ अद्भुत पुलिस कार्यवाही का सामना हम संगवारी जन को करना पड़ा। पिछले दो दिनों से जे एन यू के छात्रों को, अभूतपूर्व पुलिसिया दमन का सामना करना पड़ रहा है। देश के सभी समझदार और बुद्धिजीवी जन, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यकर्ता ”खासतौर से जो सत्ताधारी पार्टी या उसके गुर्गे नहीं हैं” इस परिस्थिती को साफ देख पा रहे हैं। इधर संगवारी जो लगातार लगभग संघर्ष के सभी मोर्चों पर होता है, मोर्चे पर कवि के आज के आयोजन की तैयारी में था।

इसी बीच जश्न-ए-रेख्ता कार्यक्रम की सूचना मिली तो ज्यादातर संगवारी के नौजवान साथियों का विचार बना कि उसमें शिरकत की जाए। ज्यादातर ने अपना रजिस्ट्रेशन करवाया और वहां पहुंचे। संगवारी हर हफ्ते शनीवार और रविवार को रिहर्सल और तैयारी करता है, लेकिन जश्न-ए-रेख्ता में संगवारी की रुचि का देखते हुए आज का रिहर्सल वाला सैशन कैंसिल किया गया और ये तय किया गया कि 3 बजे दोपहर को सभी संगवारी जन जो जश्न-ए-रेख्ता में हैं वे सभी सैंट्रल पार्क, राजीव चौक पहंुचें, और वहां मोर्चे पर कवि कार्यक्रम में शिरकत करें।

मैं घर पर था कि करीब 12:30 पर मुझे साथी नदीम का फोन आया कि वे अपने कुछ साथियों के साथ संसद मार्ग थाना के सामने खड़े हैं और संगवारी के कुछ साथियों को पुलिस जश्न-ए-रेख्ता, इगन्का से उठाकर थाने ले आई है। मैं फौरन संसद मार्ग थाना पहुंचा और अंदर जाने की कोशिश की, कि पता चले कि आखिर माजरा क्या है।

मैने सोचा कि इस आपातकाल जैसी स्थिति में हो सकता है कि सांस्कृतिक कर्मियों को उठा लेने का पुलिस को आदेश हो, और अगर ऐसा है तो फिर देखा जाए कि क्या किया जा सकता है। मैं संसद मार्ग थाने के गेट पर पहंुचा तो वहां एक हथियारबंद पुलिस वाला बैठा था जिसने मुझे अंदर जाने से रोक दिया। इस बीच मैने जश्न-ए-रेख्ता में गए साथियों के फोन पर कॉल करने की कोशिश की लेकिन वो सब फोन नहीं उठा रहे थे। मेरी चिंता बढ़ गई।
”क्या काम है?” उसने पूछा

”मैने सुना है कि जश्न-ए-रेख्ता से कुछ बच्चों को पुलिस उठा लाई है, मैं जानना चाहता हूं कि वो कौन हैं?” क्योंकि मुझे नहीं पता था कि जश्न-ए-रेख्ता से किन साथियों का पुलिस ने अपहरण किया है। पुलिस की अपहरण की ऐसी शैली से हम सभी वाकिफ हैं।

”साहब का आदेश है कि अभी दो-ढाई घंटे किसी को उनसे ना मिलने दिया जाए।” पुलिसवाले ने कहा।

”अरे भाई मुझे पता तो चले कि संगवारी के साथियों को पकड़ा क्यों है?”
”अंदर नहीं जा सकते?” उसने कहा।

मैने कहा कि कम से कम ये तो पता चले कि उठाया किस-किस को है?
”कहा ना कि अंदर जाने का ऑर्डर नहीं है। दो-तीन घंटे बाद आना।”
”अच्छा ये तो पता चले कि कौन हैं, जिन्हे पकड़ा है।”

”वो जे एन यू वाले थे क्या?” उसने सवाल के बदले सवाल किया।
संगवारी में जे एन यू के कुछ छात्र बेशक हैं, लेकिन मेरी जानकारी में उनमें से कोई जश्न-ए-रेख्ता में नहीं गया था, इसलिए मैने मना किया।
”मैं ये जानना चाहता हूं कि क्या पकड़े गए लोग संगवारी के ही हैं?”
”कुछ देर बाद आओ, फिर पता चलेगा…..”

”तब तक….?”
”तब तक पूछताछ करेंगे”

मैं और कुछ नहीं कर सकता था, उसने दरवाजा बंद कर रखा था और वो हथियारबंद था।

मैं बाहर आ गया। बाहर कुछ जानपहचान वाले लोग थे, कुछ न्यूज़ चैनलों के पत्रकार थे जो अपने कैमरे तैयार करके खड़े हुए थे।

मैने बाहर मौजूद अपने जानकारों, मित्रों से पूछा कि आखिर माजरा क्या है? उन्होने बताया कि अभी कुछ देर पहले एक जीप भरकर सात-आठ लोगों को लाया गया है, जिनमें से तीन लोगों ने संगवारी की जैकेट पहन रखी थी, इसलिए ये तो पक्का है कि पुलिस ने संगवारी के लोगों को पकड़ा है, और उनसे पूछताछ कर रही है।

मैं और चिंता में पड़ गया। इस बीच जश्न-ए-रेख्ता में मौजूद संगवारी के और लोग भी वहां आ गए, जिन्होने बताया कि वे सब साथ ही थे, और चार लोग कुछ चाय पीने थोड़ा इधर-उधर हुए थे। सिर्फ पांच मिनट के अंदर पुलिस ने वहां से चार संगवारी जन को उठा लिया था।

पहला सवाल जो मेरे मन में आया कि ये पुलिस थी या कोई गुंडाफोर्स थी जिसने यूं दिन-दहाड़े संगवारी के लोगों का अपहरण किया था। क्योंकि पुलिस होती तो कम से कम किसी को तो बताती कि उसने कुछ लोगों को पकड़ा है। इस बीच अंदर से खबर पक्की हुई कि संगवारी के तीन साथियों को पुलिस ने पकड़ के अंदर बैठाया हुआ है।

संगवारी के लोगों को अलग खड़ा करके मैं एक बार फिर अंदर जाने की कोशिश में थाने गया तो वहां मौजूद एक पुलिस वाला मुझे लगभग डांटने के अंदाज में बोला कि बाहर जाओ, अभी कुछ नहीं पता चलेगा।

साढ़े-बारह से साढ़े-तीन बजे तक मैं बाहर अपने साथियों का इंतजार करता रहा, मेरी चिंता ये थी कि कहीं पुलिस कुछ ऐसा-वैसा इल्जाम लगाकर इन साथियों को, जो सिर्फ सांस्कृतिक प्रतिरोध के लिए संगवारी से जुड़े हुए हैं, जेल में ना डाल दे, या पुलिस का क्या भरोसा, ये कुछ भी कर सकती है। मेरी निगाहें, लगातार थाने के गेट पर लगी हुई थीं।

मैं कई बार डिटेन हुआ हूं, कभी जेल भी गया हूं, बेल भी ली है। आज भी अगर मुझे पकड़ा गया होता, तो इतनी चिंता नहीं होती जितनी इन नौजवान साथियों की चिंता मुझे थी। मैं लगातार फोन कर रहा था, किसी तरह कुछ जान पाने की कोशिश कर रहा था, और वहां मौजूद साथी भी पूरी कोशिश कर रहे थे कि कुछ पता चल जाए। इस बीच किसी ने सूचना दी कि न्यूज आया है कि कुछ लोगों को उठाया गया है, लेकिन ये नहीं बताया कि किसे उठाया गया है। ये समाचार सुन कर कम से कम बहुत बुरे की शंका तो खत्म हुई, कि अगर पुलिस द्वारा साथियों को उठाने का समाचार है तो कुछ किया जा सकता है।

तभी पता चला कि संगवारी के तीन नहीं बल्कि चार साथियों को उठाया गया है, जिनमें एक साथी वो है, जो कुछ समय पहले संगवारी छोड़ चुका है। ये खबर मिलने के कुछ समय बाद ही ये साथी थाने से बाहर आ गया। साथी बहुत एजीटेटिड था। लेकिन उसने काफी कुछ बताया जिससे स्थिती का काफी कुछ पता चला।

पहली बात तो ये पता चली कि संगवारी के साथियों को इसलिए उठाया गया था, क्योंकि वो जे एन यू जैसे दिखते हैं।

सवाल ये है कि जे एन यू जैसा कौन दिखता है। जे एन यू जैसा दिखने के लिए क्या करना होता है।

उसने बताया कि पुलिस ने अचानक उन्हे घेर लिया, फिर उनके मोबाइल छीन लिए और फिर उन्हे जीप में बैठाकर थाने ले आई। उनके पूछने पर उन्हे कुछ नहीं बताया गया। थाने लाने के बाद उनसे कहा गया कि वो अपनी पर्सनल डीटेल एक कागज़ पर लिख कर दें, एक सादे कागज़ पर उनसे अपना नाम, मोबाइल नंबर, घर का पता आदि लिखवाया गया। फिर दूसरे सादे कागज़ पर वही सब लिखवाया गया। इस बीच लगातार उनसे कहा जाता रहा कि स्टूडेंट हो तो पढ़ाई करो, राजनीति में क्या रखा है। ये दाढ़ी क्यों रखी है तुमने, डेमोक्रेसी वाले हो क्या? वहां क्यों गए थे? क्या करने गए थे? इरादे क्या थे? तुम क्या बनना चाहते हो? आदि-आदि।

ये बच्चा जो बाहर आया था, बहुत आहत था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उसे क्यों उठा लिया गया। वो बार-बार मुझसे पूछ रहा था कि क्या दाढ़ी रखकर उसने गुनाह किया है। आखिर थोड़ा शांत होने पर मैने उससे पूछा कि बाकी तीन साथियों का क्या हुआ? उसने मुझे बताया कि उनसे अब ये कहा जा रहा है कि अगर वो किसी प्रोग्राम में शिरकत करने आए हैं तो प्रोग्राम के संचालक से फोन करवाएं तभी उन्हे छोड़ा जा सकता है, वरना

न्हे जब तक एस एच ओ साहब चाहेंगे तब तक वहां रखेंगे।

ये बच्चा इसके बाद वहां मौजूद मीडिया वालों के पास चला गया। मीडिया वालों का बर्ताव उसे और भौंचक कर गया। सारे मीडिया वाले जो वहां मौजूद थे, खुद उस पर ही पिल पड़े, कि पुलिस तो अपना काम कर रही है। तुम लगते ही आतंकवादी हो। एक सिर्फ ए एन आई का पत्रकार था जिसने उसकी बात सुनी और उसे ढ़ारस बंधाया। नीचे मैं उसकी एफ बी पोस्ट दे रहा हूं।

I WAS DETAINED BY THE DELHI POLICE FOR NOTHING AND RIDICULED BY THE MEDIA
This very morning, I had come all the way from Ghaziabad at the IGNCA, New Delhi to attend the “Jashn-E-Rakhta” event and listen to legendary writer Gulzar. I had attended the morning programme and met few friends from my ex-theatre group with whom I planned to go to have some tea and return. We had tea and returned at the main entrance. One of our friends felt thirsty and left for having water. Suddenly a police constable from DELHI POLICE CAME AND TOOK US FOR WITHOUT SAYING ANYTHING. They snatched our mobile phones switching it off and put in a jeep. We stopped at Parliament Colony Police Station and kept there for sometime. When enquired, the police kept mum. We met three more people who were taken before us from the same venue. Then we were made to put our details on paper and then wait till the Senior Inspector shows up. After almost an hour, the SI showed up and then enquired about us and asked WHETHER WE WERE FROM JNU. We said a clear no. Then the SI lectured on things that WE HAVE BEARD, HAIR GROWN AND WERE IN A GROUP THAT’S WHY WE WERE DETAINED. STUDENTS SHOULD BE AWAY FROM POLITICS AND TERRORISTS CAN BE FROM ANYWHERE AND ANY PLACE. SO PLEASE COOPERATE. When we asked about having a document from them on writing that why we were detained and we are all clear on which they said that ITS A ROUTINE INVESTIGATION AND NOTHING WOULD HAPPEN. ANOTHER INSPECTOR CAME UP AND THEN ASKED ABOUT OUR DETAILS. HE ALSO JOKED ABOUT OUR APPEARANCES ON WHAT WE WEAR AND PRESENT. One of us was carrying a flag of a party which was used in a demonstration day before to which this inspector said LIKE YOU WILL ALSO CARRY A WEAPON THEN?
When we were freed, I wanted to go on record to tell everything to which a SENIOR JOURNALIST SAID THAT THEY ARE DOING THEIR JOB AND YOUR APPEARANCE LOOKS LIKE THAT OF A TERRORIST SO ALL THIS WAS FOR SECURITY AND THESE YOUNGSTERS ARE STUPID AND HAVE NO IDEA. An ANI journalist sympathized with me and took my byte, I got my phone back and I carried on with my Next project for the day.
There were many people at the “Jashn-E-Rakhta” event who were entering from backside unchecked. Why the police isn’t detaining them? We went inside with full checking and why this stupid attitude by the police like the people in the West on having beard as part of being a terrorist? WHY OUR DETAILS TAKEN WHEN WE WERE CLEAR AND WAS IT FOR THEIR NEXT FRAMING? WHY THIS UNDECLARED EMERGENCY? WHAT’S MILITANCY GOT TO DO WITH YOUNGSTERS WHO HAVE COME TO HEAR A LEGENDARY POET WITH PROPER REGISTRATION? AND WHY NO INFORMATION WAS GIVEN WHEN WE WERE BEING DETAINED?
PLEASE GUYS, SPREAD THE MESSAGE, SHARE THIS STATUS AND HELP US FIGHT AGAINST THIS INJUSTICE.
उसके कुछ देर बाद मैने मोर्चे पर कवि के आयोजक को फोन किया जिसने अंदर मौजूद हमारे साथी को फोन किया। और इसके बाद हमारे तीन साथी बाहर आ पाए।

बाहर आने पर हमारे साथियों ने बताया कि उन्हे इसलिए उठाया गया था, क्योंकि वो जे एन यू जैसे लग रहे थे। उनके पास ढपली थी। उनकी दाढ़ी थी, और वो थोड़े से गंभीर लग रहे थे। पुलिस को लगा कि ऐसे गंभीर लगने वाले लोग की देश के लिए खतरा हैं, और उन्हे अपहरण स्टाइल में पकड़ लिया गया।

खैर, इतना सब होने के बाद, शाम करीब साढ़े चार बजे संगवारी के साथियों को छोड़ा गया। इस बीच संगवारी के साथी मोर्चे पर कवि में पहुंचे, अपनी उपस्थिती दर्ज़ करवाई और वापस आए।

यहां दो बातें जो आपसे करनी हैं,

एक: ये कोई सिर्फ कहने वाली बात नहीं है कि देश में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है। जब आप किसी को भी, कहीं से भी, बिना किसी कारण उठा लें। किसी को पता भी ना चलने दें कि उसे पकड़ लिया गया है, तो इस तरह की असीम ताकत पुलिस को कब मिलती है? तुम जे एन यू वाले दिखते हो? तुम डेमोक्रेसी वाले हो क्या? आखिर पुलिस के ये कथन क्या बताते हैं। एक इस देश में डेमोक्रेसी की बात करने वाले को पुलिस पकड़ लेगी। दूसरे पुलिस ने जे एन यू को टारगेट किया हुआ है। अगर किसी के हाथ में ढपली हो, कोई सांस्कृतिक कर्मी जैसा लगेगा तो पुलिस उसे नहीं छोड़ेगी।

दूसरे: संगवारी इसके बावजूद मोर्चे पर कवि कार्यक्रम में गया, हम जे एन यू भी जाना चाहते थे, लेकिन इस सबके बाद वापस आते, मिलते, काफी देर हो चुकी थी और पता चला कि जब तक हम जे एन यू पहुंचेंगे, तब तक कार्यक्रम खत्म हो चुका होगा। संगवारी इन पुलिसिया हरकतों से डरता नहीं है, जिन बच्चों को पकड़ा गया उन्हीं का बाद में इसरार रहा कि जे एन यू चलते तो थोड़ा वहां के साथियों को हिम्मत देते कि हम तुम्हारे साथ ही हैं।

खैर……
ये सब इसलिए ताकि साथियों को, मित्रों को पता रहे कि क्या चल रहा है।

 

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