भारत में बढ़ता ई-कॉमर्स का रुझान, लेकिन सबीर भाटिया क्यों बर्बाद हो गए?

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इरशाद अली 

त्यौहारों का सीज़न शुरू हो चुका है, नवरात्रि और दशहरा जैसे त्यौहार ख़त्म हो चुके हैं और इसी कड़ी में अब आमद है शुभ दीपावली की ।

लोग तैयारियों में जुट चुके है जिसका सीधा-सीधा मतलब जाता है कि साल में एक बार जमकर खरिदारी कर ली जाए। जब भी कोई बड़ी खरिदारी हमें अपने घर के लिए करनी होती है हम आमतौर पर सोचते है कि चलो दिवाली पर खरिदेगें जिसे पूरा परिवार मान भी लेता है। इसीलिए फेस्टिव सीजन में बाजारों की रौनक देखने लायक होती है, दुकानों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है, नये-नये तरह के आॅफर पेश किए जाते है, गोदामों को भर लिया जाता है।

इस दौरान बाजारोें में खचाखच भीड़ हमें दिखाई देती है। ये अब तक का वो सीन था जो हम हमेशा से देखते आ रहे है।

लेकिन अब आॅनलाइन खरिदारी ने इस तस्वीर को बदल दिया है। ये पिछले बीस सालों के बदलाव की पहली झलक है जो भारतीय बाजारों में अपने पूरे जोशोखरोश के साथ नुमाया हो रही है ।

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हमें पता होना चाहिए कि 1995 में इंटरनेट भारत मेें आया था। दुनिया को ईमेल का तोहफा देने वाले सबीर भाटिया जिन्होने हाॅटमेल का निर्माण किया था और माइक्रोसाफ्ट में एक अहम भूमिका रखते थे अपनी कम्पनी और सबकुछ बेचकर भारत में पहला आॅनलाइन बाजार शुरू किया था आरजू डाॅटकाम के नाम से जिसके बारे में उनका कहना था कि अब भारतीय आॅनलाइन खरिदारी को प्राथमिकता देगें ।

लेकिन उस समय उनका ये प्रयोग बेहद नाकाम रहा और सारा पैसा डूब गया। सबकुछ गंवाने के बाद उन्हें बाद में बंगलुरु की एक छोटी सी कम्पनी में नौकरी करनी पड़ी। उन्होने जो सोचा था वो गलत नहीं थे, लेकिन समय से पहले उन्होने ये कर दिखाया जबकि उस समय लोगों के पास ना कम्प्यूटर थे ना इंटरनेट था ना आज की तरह के एंडवांस मोबाइल थे इसलिए अरबपति सबीर भाटिया का सारा पैसा डूब गया जो अपनी कम्पनी बेचने के एवज में उन्हें बिलगेट्स से मिला था।

तो फिर उनके इस आईडिये का फायदा किसे मिला? फायदा मिला सचिन बंसल को, कुनाल बहल , प्रवीन सिन्हा , अरूण चन्द्रा, विवेक गौर, सन्दीप शर्मा को ।

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ये एक लम्बी लिस्ट हैं। शायद आपने इनमें से किसी का नाम ना सुना हो लेकिन आपने फिल्पकार्ट, स्नेपडील, येपमी, जबोंग, मिन्त्रा, होमशाॅप 18, नापतौल जैसे बड़े ब्रांड नाम अपने जरूर सुने होगें। ये भारत की बड़ी ई-कामर्स कम्पनियां है जो आॅनलाइन शापिंग वेबसाइट रन करती है।

आपको और भी हैरत इस बात से होगी। अभी पिछले एक हफ्ते में ही अकेली अमेजन, फिल्पकार्ट, स्नैपडील ने करोड़ो रूपये का सामान अपनी साइट्से बेचकर दिखाया। कमाल के डिस्काउंट पैकेज और शानदार छूट वो अपने निर्धारित दिनों में पेश कर रहे है जिससे एक बड़ा क्राउड इस तरफ आर्कर्षित होता है और आसान खरिदारी के चलते जमकर सामान खरिदते है।

सबीर भाटिया के सपने को आज कोई और पूरा कर रहा है। स्मार्ट फोन के आने से सारी दुनिया आपकी पाॅकेट में आ जाती है। ऐसे में इस नज़रिये का फायदा उठाने वाले कहां चूकने वाले थे।

इनदिनों आप मेट्रो में, होर्डिग्स पर, टेलिविजन पर इस तरह की ईकाॅमर्स साइट्स के विज्ञापन खूब देख रहे होगें जो आपको आपके घर पर सुबह के नाश्ते से लेकर रात का डिनर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी लेते है।

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खरिदारी के बदलते इस मिजाज के बारे में बात करते हुए येपमी के को-फाउंडर विवेक गौर कहते है कि ‘हमने इस तरह के प्लेटफार्म को ग्राहकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही तैयार किया है।’

वहीं फिल्पकार्ट के संजीव बंसल का कहना है कि ‘हमने कम से कम कीमत में प्रोडक्ट को यूजर तक पहुंचाने को अपनी प्राथमिकता बनाया हुआ है जिसे हम एमओपी (मिनीमम आॅपरेटिंग प्राइज) कहते है।’

दूसरे और भी नये एंटरप्रेन्योर नयी-नयी तरकीबों से इस बाजार को बढ़ा रहे है क्योंकि ये सारा ग्लोबल बाजार एक पाॅकेट में आ जाता है और आपको मनचाही चीजें आपकी ही कीमतों में मिल जाती है। आने वाले समय में इस तरह के नये वेबपोटर्लों और ठिकानों की मांग में तेजी से बढ़ोत्तरी होने की सम्भावना है। जबकि हमारे परम्परागत् बाजार इस तरह के नये चलन से वाकिफ नहीं है। अपनी साख को बचाने के लिए वो क्या नया लेकर आएगें ये सबसे सामने होगा।

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