अगर दिल्ली से बीजेपी कुछ सीख ली होती तो आज बिहार चुनाव में उसे मुंह की नहीं खानी पड़ती

0

कमलेश के. झा

जिस बिहार की धरती पर सीता ने जन्म ली हो,  गांधी की कर्मभूमि रही हो, सम्राट अशोक की शक्तिभूमि-धर्मभूमि ये बिहार और वाल्मिकी ने जहां रामायण की रचना की हो भला ऐसे बिहार में अगर चुनाव हो तो फिर देश ही नहीं, दुनिया की नजरें भी टिकी तो रहेंगी ही।

बिहार चुनाव पर टिकीं नजरों को इस परिणाम से कितनी ठंढक मिली है, इस बारे में कुछ कह पाना कठिन है, लेकिन यह परिणाम केंद्र में बैठी मोदी सरकार, उससे संबंधित दल और उससे जुड़े लोगों के लिए न सिर्फ फौरी संकट है, बल्कि उनके भविष्य के लिए एक बड़े संकट का संकेत भी है।

बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित हो चुके हैं, और जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस को मिलाकर बने महागठबंधन ने दो-तिहाई बहुमत से जीत दर्ज कराई है।

इन चुनावों से यह साफ संकेत मिल रहा है कि अब प्रधानमंत्री मोदी कैसे राज करेंगे। बिहार चुनावों में जिस तरीके से अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया वह भी मोदी के लिए घातक सिद्ध हुआ। मोदी ने कहा था कि नीतीश कुमार के डीएनए में कुछ गलत है। उन्होंने कहा कि लालू यादव शैतान हैं। उन्होंने कहा कि दो बिहारी और राहुल गांधी मिलकर थ्री इडियट्स हैं।

हालांकि ये बात भी सच है कि मोदी के लिए भी महागठबंधन ने अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। लालू ने कहा था कि मोदी ब्रह्मपिशाच है, नीतीश ने भी कहा था कि मोदी जुमलेबाज हैं, इसके लिए कुमार ने मुशायरे के अंदाज मे कहा था कि गुजरात से आया था वो…काला धन लाने वाला था वो…कहां गया उसे…..।

लेकिन जिस तरीके से प्रधानमंत्री मोदी बिहार विधानसभा में प्रचार-प्रसार में जुटे हुए थे इससे तो यही संकेत मिल रहा था कि वो प्रधानमंत्री कम औऱ बीजेपी के प्रचारक ज्यादा हैं। इसलिए प्रधानमंत्री अपने जिम्मेवारी से भी नहीं बाग सकते और इस हार के लिए जिम्मेवार भी तो फिर वही ही हैं न।

Also Read:  केरल: हत्या के मामले में RSS के 11 कार्यकर्ताओं को दोहरा आजीवन कारावास

इसके साथ ही बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह द्वारा कहा जाना कि अगर महागठबंधन जीतेगी तो पटाखे पाकिस्तान में फोड़े जाएंगे। साथ ही इस चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण भी किया गया जिसके कारण दादरी जैसे मुद्दे को बार-बार उछाला गया।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा आरक्षण में समीक्षा की बात। साथ ही पार्टी के अंदर ही गुटबाजी का होना और आडवाणी, शत्रुघ्न सिन्हा और आरके सिंह जैसे प्रमुख नेताओं का नाराज होना भी बीजेपी की हार का कारण रहा होगा।

बिहार चुनावों में जिस तरह का प्रचार देखने को मिला उसके उदाहरण हमारी राष्ट्रीय राजनीति में कम ही मिलते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह का जहर बोया गया उसका खामियाजा तो फिलहाल बीजेपी को मिली है लेकिन आगे इसकी कीमत भारत को चुकानी पड़ सकती है। हमने 1992 में (बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद) ये देखा है और हमें फिर इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए।

आगे अगर बात करें तो केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार सत्तारूढ़ होने के बाद मोदी ने देश-दुनिया को जो संकेत दिए और अपने वादों, घोषणाओं से जो वातावरण बनाया था, उससे सभी की उम्मीदें जगी थीं। लेकिन दिन बीतने के साथ ही सत्ताधारी दल के कुछ अलग रंग दिखने लगे। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देश में जिस तरह-तरह की मुहिम चलाई गई, और उससे जो वातावरण बना, उस पर सरकार मौन बनी रही है। चाहे वह असहिष्णुता की बात हो या फिर दादरी की।

Also Read:  VIDEO: CM योगी के हिदायत के बाद भी नही सुधर रहे पुलिसकर्मी, टिकट के पैसे मांगेने पर की मारपीट

इस वातावरण से उपजे असंतोष ने बिहार के इस चुनाव परिणाम में मदद की है, वहीं यह चुनाव परिणाम अब दुनिया की नजरों को प्रधानमंत्री मोदी और उनके वादों, घोषणाओं पर निर्णायक नतीजे पर पहुंचने में भी मददगार होगा।

बिहार का चुनाव परिणाम इस लिहाज से बहुत मायने रखता है, और इसी मायने के कारण प्रधानमंत्री मोदी, बीजेपी और आरएसएस किसी भी कीमत पर यह चुनाव जीतना चाहते थे।

सवाल अब यह उठता है कि आगे क्या? सवाल बिहार और बिहार के विकास का नहीं है, मोदी और बीजेपी के भविष्य का है। उन्होंने देश के सामने तमाम घोषणाएं की हैं, चुनाव से पहले बिहार के लिए भी भारी-भरकम घोषणा की है। क्या वह अपनी घोषणाएं पूरी कर पाएंगे?

इस चुनावी परिणाम से बीजेपी के अंदर भी सुगबुगाहट होगी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और बाकी नेता जो दो साल पहले तक ख़ुद को मोदी के बराबर का मानते थे, मोदी के लिए अब उन्हें सिर्फ़ हाथ के इशारे से नियंत्रण करना आसान नहीं होगा। ऐसे नेता अब अपनी उपस्थिति ज़ाहिर करने पर ज़ोर लगाएंगे और विद्रोह का बिगुल भले ही खुले तौर पर न बजे लेकिन कहानियां लीक होनी शुरू होंगी। प्रधानमंत्री का ख़ौफ़ कम होना शुरू हो गया है और अब यह उन पर निर्भर करता है कि वह फिर कैसे अपनी प्रभुसत्ता क़ायम करते हैं।

बिहार चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति पर भी नकारात्मक असर होगा। संसद में काम बाधित होगा और संजीवनी प्राप्त कांग्रेस संसद में और अधिक आक्रामक रुख़ दिखाएगी।

इस चुनाव से एक बात औऱ साबित हुआ है कि कभी विश्वसनीय माने जाने वाले अधिकांश एग्जि़ट पोल ग़लत साबित हुए हैं। चाणक्य ने बीजेपी के लिए 150 सीटों की भविष्यवाणी की थी लेकिन उसका एग्जि़ट पोल ग़लत निकला। लगभग 75000 नमूने लेने वाले एनडीटीवी का सर्वे भी ग़लत साबित हुआ। यह संख्या उल्लेखनीय है क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में क़रीब 9000 का सैंपल ही लिया जाता है।

Also Read:  स्मृति ईरानी को बीजेपी विधायक ने याद दिलाया कि कर्नाटक भी भारत का हिस्सा है

इस चुनाव में मीडिया की कमजोरी भी सामने आ गई है ख़ासकर जिस लापरवाह तरीक़े से विश्लेषकों ने डेटा पर अपनी राय रखी। शुरुआती रुझानों के आधार पर ही बीजेपी की लहर बता दी गई।

इन सबके बीच बीजेपी को अपने अंदर टटोलना होगा कि अब राजनीति हिंदुत्व के नाम पर या दादरी के नाम पर नहीं लड़ा जा सकता इसके लिए बीजेपी के संगठन आरएसएस को खासकर विचार करने की जरूरत है।

साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि जिस तरीके से जम्मू के मुख्यमंत्री यह कहते आ रहे हैं कि मोदी को अभी केंद्र से दस सालों तक कोई नहीं हटा सकता उस पर भी प्रश्न चिन्ह लगते दिख रहा है।

खैर जो भी अंततः एक बात तो कही ही जा सकती है कि अगर दिल्ली विधानसभा चुनाव से बीजेपी कुछ सीख ली होती तो शायद आज उसे इस तरीके से बिहार चुनाव में मुंह की नहीं खानी पड़ती। लेकिन फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि इन सभी प्रश्नों के उत्तर खुद मोदी, बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) को तलाशने हैं और इस से सबक लेने की भी जरूरत है और अगर समय रहते इन प्रश्नों के उत्तर नहीं ढूंढे गए तो आने वाले पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी हार का सामना करना पड़ सकता है।

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here