पत्रकार और जोकर होने के बीच की रेखा का अंतर क्या होता है? आप भी जान लिजिए इन ब्रेकिंग मिश्रा जी से

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किसी विचारधारा विशेष की पैरवी करने वाले लोग जब पत्रकार का लिबास पहनकर लोकतंत्र की दुहाई देते है तो वह ये भूल जाते है कि एक पत्रकार कितना संयमी और सहनशील होता है अपने सामने वाले मेहमान के साथ। अगर पत्रकार भी बुलाए गए मेहमान के साथ उग्र हो जाए तो फिर शायद पत्रकारिता उसका करियर न बन सके। किसी पत्रकार का कमाल ये होता है कि वह बेहद तरकीब के साथ सामने वाले का असली चेहरा जनता के सामने लेकर आ जाता है।

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई और राज ठाकरे का इंटरव्यू इस मामले में बेहद मशहूर हुआ था। राज ठाकरे ने बेहद उग्र होते हुए राजदीप पर धमकी देने की मुद्रा अपना ली थी लेकिन राजदीप ने अपनी सौम्यता बिल्कुल नहीं खोई और शांत रहते हुए राज ठाकरे के साथ पूरा इंटरव्यू खत्म किया।

ऐसा ही कुछ करण थापर और पीएम मोदी के इंटरव्यू के दौरान हुआ था। पीएम मोदी को बीच इंटरव्यू में पानी की जरूरत आन पड़ी थी और उन्होंने कहा कि मैं इस पर जवाब नहीं दूंगा लेकिन मैं चाहूंगा कि करण हमारी दोस्ती बनी रहे।

ऐसे बहुत सारे उदाहरण है। जब पत्रकार सिर्फ एक पत्रकार रहा और लोकतंत्र की मजबूती के लिए बिना किसी विचारधारा को दर्शाए हुए अपनी बात कहता रहा है। ताज़ा मामले में एक ‘पत्रकार’ ब्रजेश मिश्रा का मामला सामने आया है। ब्रजेश मिश्रा ने लखनऊ से नोएडा तक अपने बड़े-बड़े होर्डिग लगा रखे है जिसमें वो मुनादी करते हुए कहते है कि ब्रेकिंग मिश्रा है, जहां वो है ख़बर है वहां।

इन विज्ञापनों से पता चलता है कि पत्रकार के होने से खबर बनती है या फिर खबर के होने से पत्रकार बनता है। कहीं खबर होगी तो ब्रेक भी होगी या फिर कहीं पत्रकार होगा तो खबर बनेगी।

जेम्स बांड की एक फिल्म में मीडिया मुगल अपने खबरिया चैनल की लाॅचिंग में बड़े-बड़े जहाज डुबा देता है फिर उस पर खबरे प्रसारित करता है। वो खबरों के लिए पहले घटनाएं आयोजित करवाता था फिर ब्रेक करता था। शायद इसी बात को सोचते हुए मनोवैज्ञानिक और ‘जनता का रिपोर्टर’ की सह-संस्थापक लुबना उस्मान ने अपने ट्विटर हैंडल से पत्रकार ब्रजेश मिश्रा के होर्डिग वाली तस्वीर को ट्वीट किया और पत्रकार के पीछे खबर के भागने पर आश्चर्य व्यक्त किया।

ये एक सहज बात थी जिस पर मिश्रा ने जवाब देते हुए लिखा कि ‘मुझे वास्तव में ISI एजेंटों से पत्रकारिता के प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है।’

ये टिप्पणी खुद को पत्रकार कहने वाले इन महाशय की मुस्लिम और इस्लाम विरोधी नज़रिये को दर्शाता है। ये दरअसल वहीं लोग है जिन्होंने पत्रकारिता के पेशे को बदनाम करने में अहम योगदान दिया है।

इन महानुभाव के लिए पत्रकारिता का वास्तत में मतलब नेताओं और पूंजीपतियों के साथ सबंध और फिर उनके पैसे से चैनल खोलकर पैसा कमाना होता है।

जब हम मिश्रा का ट्वीट्र प्रोफाइल चैक करते है तो पाते है वह एक न्यूज चैनल प्रमुख के तौर पर अपने आप को दिखा रहे है। इतने वरिष्ठ पद पर बैठा हुए आदमी एक सहज प्रतिक्रिया पर इतना उग्र हो जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी ने उसकी दुखती रग पर हाथ डाल दिया। जब हम प्रणय रॉय, राजदीप सरदेसाई या रवीश कुमार जैसे पत्रकारों को बिना आडम्बर के अपना काम करते देखते है तो बाकि का ढोल पीटने वाले लोग पत्रकार कम जोकर ज्यादा दिखाई देते है।

मिश्रा ने बिना कोई खंडन किए हुए सीधे तौर पर एक मुस्लिम नाम होने के कारण ISI से जोड़ने की हिमाकत पर बता दिया कि वह लोकतंत्र को किस दृष्टि से देखते है। उनके इस ट्वीट के बाद खुद उनके ही ट्वीट्र हेंडल पर लोगों ने इसकी कड़ी आलोचना की।

जब आप खुद को वरिष्ठ पत्रकार कहने वाले इन ब्रेकिंग मिश्रा जी की कुंडली पर नजर डालेगें तो पाएगें कि ये साहब मुकेश अंबानी के चैनल ETV में कार्यरत् थे, फिर इन्होंने UPTV नाम से चैनल लांच करने की कोशिश की लेकिन जब वहां लाईसेंस मिलने में दिक्कत हुई तो मोटी रकम में रातोंरात नेशनल वाॅयस नामी ये चैनल खोल डाला।

लखनऊ के पत्रकार वर्ग में उनके कारनामों की चर्चा आम है कि किस तरह एक मंत्री के साथ मिलकर टेंडर में कमीशन लिया करते थे। सोशल मीडिया और पत्रकारिता के बीच जो महीन रेखा है उसमें तथ्यों की पृष्टि और प्रमाणिकता का अंतर होता है।

सोशल मीडिया पर कहीं गई बातों की प्रमाणिता के मापदंड से नहीं आंका जाता है। इसमंे सच्चाई की गुजांइश कम मानी जाती है लेकिन पत्रकार जब अपने मंच से किसी बात को कहता है तो वह जिम्मेदारपूर्ण होती है।

आमतौर पर देखा गया है कि जो लोग पत्रकारों के भेष में किसी विचारधारा विशेष का लबादा ओढ़ कर बैठ गए है उनकी सच्चाई किसी भी पत्रकार के सामने जोकर से अधिक कुछ नहीं दिखाई देती।

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