लालू-नीतीश-शहाबुद्दीन-शराबबंदी और पत्रकार: थैन्क-यू माई लॉर्ड

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थैन्क- यू माई लॉर्ड !!! भारतीय टीवी चैनल अब भारत-पाक बॉर्डर से घर लौट सकते हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने बाहुबली नेता शहाबुद्दीन की बेल रद्द कर दी है और पटना हाई कोर्ट ने नीतीश सरकार की नई शराबबंदी कानून पर रोक लगा दी है। फिलहाल ये दोनों मामला मिडिया की दुकानदारी के लिये ठीक लग रहा है क्योंकि इसमें टीआरपी का सारा मसाला मौजूद है। बिहार है, लालू- नीतीश हैं, बाहुबली शहाबुद्दीन है, शराबबंदी से आहत पत्रकारों के लिये भड़ास निकालने का अवसर भी है।

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कुछ दिनों पहले दिल्ली से शाम को पटना आये एक राष्ट्रीय अखबार के संपादक को ठीक अहले सुबह वापस दिल्ली भागना पड़ा था कि पूरी रात सिर्फ एक बोतल शराब की खोज में उनके गुर्गे हाथ- पाँव मारते रहे और उधर संपादक जी ने करवटें बदलते रात गुजारी। उन्होंने कसम खाई की जब तक शराबबंदी नहीं होगी बिहार नहीं लौटेंगे। यही नहीं हाल के दिनों में बड़ी दवा कंपनियों और अन्य बिजनेस घरानों के एक्जिक्यूटिव की मिटिंग कोलकाता या लखनऊ होने लगी थी तो पटना के होटल वाले भी हकलान थे, कईयों के खिलाफ मुकदमें दर्ज किये गये, कई जेल भेजे गये थे। रईसों, व्यापारियों, पत्रकारों सबका दर्द भी ऐसा था कि किस मुँह से दारू बिन सूनी अपनी जिन्दगी के दुख भरे दास्तान की बयानगी करते। सत्ता के गलियारे में घुमने वाले इन तमाम लोगो की स्थिति यह थी की मन ही मन शराबबंदी को कोंसते थे और हुजूर के सामने कहते कि- क्या क्रांतिकारी और क्या ऐतिहासिक कदम है। आखिर माई लॉर्ड ने इन सबकी सुन ली।

2005 में जब नीतीश की सरकार आई थी तो पूरे बिहार में उनकी सरकार की नीति के कारण ही गली- मुहल्ले, चौक- चौराहे, मंदिर- मस्जिद- गुरूद्वारा- चर्च या फिर स्कुल- कॉलेज इनके 50 से 100 मीटर की दूरी में भी शराब की दुकाने दिखने लगी थी। लेकिन बीजेपी के गठबंधन में होने के कारण नीतीश को छवि की उतनी चिंता नहीं करनी पड़ी थी। इस दौर में मिडिया का भी ऐसा साथ था जब जस्टिस काटजू ने बिहार में मिडिया सेंसरशिप की जाँच के लिये एक कमिटी का गठन भी कर दिया था। 2015 में लालू यादव के साथ गठबंधन में आये इमेश कॉन्सियस नीतीश कुमार ने सरकार गठन के बाद अचानक नैतिक गुरू की भूमिका में आकर पूर्ण शराबबंदी की घोषणा कर डाली। जाहिर है गठबंधन में होकर भी वे छवि की लड़ाई लड़ रहे थे। लेकिन नीतीश कुमार को भी मालूम था कि शराबबंदी के बाद बिहार को तकरीबन 4 हजार करोड़ से ज्यादा की राजस्व हानी होगी तो सरकार के लिये एक आर्थिक चुनौती भी थी। वैसे इस फैसले के आने तक नीतीश देशभर में शराबबंदी की मुहिम को लेकर राजनीतिक संपर्क और मोरल गुरू की अपनी इमेज बिल्डिंग में लगे हैं तो जाहिर है वो राजनीति में अपनी छवि गढ़ने में भी सफल दिख रहे हैं। फिलहाल कोर्ट के फैसले ने नीतीश कुमार को कितनी राहत दी होगी लेकिन सरकार के नीचे बैठे महकमें में इस फैसले को लागू कराने के लिये पसीने छुड़ा रहे लोगों को राहत जरूर दी है। इनकी भी माई लॉर्ड ने सुन ली। वैसे यह जान लेना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने बिहार सरकार की नई आबकारी नीति पर सवाल उठाया है, शराबबंदी को गलत नहीं ठहराया है तो नीतीश कुमार से उम्मीद है कि वे एक बेहतर नई नीति के साथ शराबबंदी को लागू करेंगे, यह उनकी अबकी बदली हुई राजनीति और छवि दोनों के लिये जरूरत भी है। वैसे बिहार की आम आवाम शराबबंदी से जरूर सुकून महसूस कर रही थी।

अपने बेटे तेजस्वी को उप- मुख्यमंत्री के ओहदे पर स्थापित कर लालू यादव ने विरासत की बागडोर सौंप दी। लेकिन लालू जानते थे कि जिस राजनीतिक शैली के वो माहिर खिलाड़ी है वो उनके बेटे की छवि के लिये बेहतर नहीं है। लिहाजा आरजेडी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शहाबुद्दीन को जगह देने पर लालू यादव की मिडिया ने भले ही खिंचाई की हो। लेकिन लालू यादव ने कमोबेश शहाबुद्दीन को जवज्जो देना बंद कर दिया था जो शहाबुद्दीन की पत्नी को राज्यसभा या विधान परिषद् नहीं भेजने के फैसले से भी जाहिर है। अब बेल होते ही शहाबुद्दीन ने जब नीतीश के प्रति उपेक्षा भरा बयान दिया और लालू यादव की इज्जत आफजाई की। तो इस बयान के बाद जाहिर सी बात है कि मिडिया के दबाव में शहाबुद्दीन को अपने गले में घंटी की तरह बाँधना लालू की मजबूरी हो गई। शहाबुद्दीन मामले में लालू बार- बार कोर्ट के हवाले से अपना बचाव करते रहे कि ये कानून का फैसला है लेकिन मिडिया ने उनके मुँह में घुँसकर लालू को शहाबुद्दीन का समर्थक और नीतीश को शहाबुद्दीन के विरोधी खेमें का दिखलाया। जबकि हकीकत की बात ये है कि 2005 से 2015 के बीच जब नीतीश कुमार बीजेपी गठबंधन में सत्ता में थे तो शहाबुद्दीन को न सिर्फ हाईकोर्ट से सभी मामलों में बेल मिलती गई जबकि सभी नरसंहारों के आरोपी छुटते गये। इस दौर में लालू बिहार में विपक्ष की भूमिका में थे।

शहाबुद्दीन के मामले में जब प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की तो नीतीश कुमार ने आनन- फानन में याचिका दायर करवाई जाहिर है कि उन्हें अपना दामन और छवि दोनों बचानी थी। लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण ने क्रेडिट बटोर ली वहीं बिहार सरकार को फजीहत भरा फटकार झेलना पड़ा। अब शराबबंदी और शहाबुद्दीन के मामले में देश के राजनीतिक विश्लेषक किसी की चीत और किसी की पट दिखा रहे हों लेकिन राजनीति में कई बार जो दिखता है वही नहीं होता और जो नहीं दिखता है वहीं हो जाता है। 30 सितम्बर, 2016 को जब ठीक आधे घंटे के भीतर दो फैसले- एक सुप्रीम कोर्ट से शहाबुद्दीन मामले में और दूसरा पटना हार्ईकोर्ट से शराबबंदी मामले में आया तो इसने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर लालू यादव, नीतीश कुमार दोनों को माई लॉर्ड के फैसले से राहत मिली होगी।

राजनीति चलती रहेगी लेकिन नहीं छोड़ना है भाईयों। मौका है- दस्तूर है, तोड़ दो- फोड़ दो। दारूबंदी ने पत्रकार बिरादरी का जो एक- एक बूंद के लिये कंठ सुखा दिया था- तड़पाया था उसको याद रखना है। पत्रकारिता की कसम दारूबंदी के नाम पर नीतीश कुमार और शहाबुद्दीन के नाम पर लालू यादव से पुराना खुन्नस, सब चुका लेना है- अपनी कुंठा मिटा लेना है। ऐसा मौका मुफ्त में कहां मिलेगा। थैन्क- यू माई लॉर्ड !!!

निखिल आनंद एक सबल्टर्न पत्रकार है। इनसे nikhil.anand20@gmail.com पर संपर्क कर सकते है।

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