चेन्नई आज फिर तड़प रहा है, जनता की समस्याओं को नज़रअंदाज़ किया जाना कब बंद होगा?

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इरशाद अली 

चेन्नई आज फिर तड़प रहा है, एक सप्ताह पहले भी यहां हाहाकार मचा था। उस समय भी कारण एक ही था। एक हफ्ता पहले भी मूसलाधार बारिश से पैदा हुई बाढ़ की स्थिति ने आम जीवन अस्तव्यस्त कर दिया था। डेढ़ सौ से ज़्यादा लोग मारे गए थे सो अलग ।

चेन्नई कोई देश का एक अविकसित दूरदराज़ का गाँव नहीं है। यह भारत के चार सब से बड़े शहरों में से एक है। तो फिर ऐसा क्यों हुआ ? क्या इस तबाही केलिए पर्यावरण को दोष देना काफी है?

हो सकता है कि इस बेमौसम बारिश केलिए कहीं न कहीं पर्यावरण में होने वाली तब्दीली ज़िम्मेदार हो। लेकिन यह कहना कि इस बड़े पैमाने पर तबाही की वजह सिर्फ पर्यावरण में होने वाला बदलाव है तो यह एक बेवकूफी होगी ।

चेन्नई में बारिश से पैदा होने वाली तबाही को बचाया जा सकता था अगर हम ड्रेनेज सिस्टम या पानी की निकासी के इंतज़ाम को चुस्त दरुस्त करने में थोड़ी दिलचस्पी दिखाई होती।

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आज हमारे लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है को हमारे प्रतिनिधियों को हमारे आराम का ख्याल सिर्फ उस समय होता है जब उन्हें हमारे वोटों की ज़रुरत होती है। एक मर्तबा मतलब निकल गया तो भांड में जाये जनता और उसकी समस्याएं।

जनता को जूते की नोक पर रखे जाना भारत में कोई नयी बात तो है नहीं।

अगर आपने चमचमाते विज्ञापनों की वजह से देश की तस्वीर एक ऐसे भारत की बनाई है जो विकास की दौड़ तेजी से आगे बढ़ रहा है तो रात से हो रही चैन्नई की बारिश से बनी विकराल समस्या को देख लीजिये, आपको पता चलेगा कि चैन्नई किसी अफ्रिका के घने आदिवासी इलाके की तरह प्रतीत हो रहा है ना कि भारत का एक मेट्रो सिटी।

हमारी देश में बुनियादी सुविधाओं का इतना अकाल है कि एक तेज बारिश भी भंयकर त्रासदी में बदल जाती है। जबकि इसके विपरित हम ढोल पीटते हुए दिखते है कि कितनी तेजी के साथ भारत को विकास की और अग्रसर कर रहे है। पिछले कुछ वक्त में कलकत्ता की बारिश और मुम्बई में आई भारी बारिश हमारे खोखले दिखाओं की पोल खोल कर रख देती है।

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हम निकास स्तर पर भी इस तरह की समस्याओं से निपटने के लिये तैयार नहीं हुए है और दुनिया को दिखाते है कि हम अपना यान मंगल पर भेज सकने की क्षमता रखते है। अभी तक भी भारत के किसी भी शहर में नगरपालिका तक के स्तर पर हम बुनियादी सुविधाओं से वंचित है और इसके लिये सिर्फ और सिर्फ हमारे देश का नेतृत्व और अफसरशाही जिम्मेदार है।

क्यों वे पहले से इस तरह की आपदाओं से निपटने के लिये तैयार नहीं होती। आज चैन्नई से जो तस्वीरें आ रही है उनमें स्कूल में फंसे हुए सैकड़ों बच्चे, यातायात व्यवस्था का चरमरा जाना, पानी की निकासी ना होना, गन्दगी का सैलाब आ जाना और भी ना जाने कितनी परेशानियों से वहां के लोगों को उठानी पड़ रही है।

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जयललिता सरकार की कारगुजारी जमीन के इतने छोटे स्तर पर पूरी तरह नाकाम होती दिखी। क्यों भारत के हर कस्बें, सूबे और जिले का लगभग यहीं हाल है। यहीं नहीं इसके बाद जो भूखमरी, बीमारी, जनसंचार के फेल होने की समस्याएं आएगी, सरकार और प्रशासन के पास उनसे निबटने के लिये भी कोई प्लान नहीं होता है और कछुवें की चाल से अफसरशाही ऐसी आपदाओं से निबटती हुई दिखती है।

यहां देशभर के सारे नेताओं के विकास के वादें झूठे साबित हो जाते है और खूद आम जनमानस ही एकदूसरे की मदद करता हुआ दिखाई देता है जबकि सरकार और प्रशासन अपनी फाइलों में विकसित भारत के चेहरे पर एक स्टार और बढ़ा देता है।

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