भाजपा का दिल्ली और बिहार की शर्मनाक हार से कुछ न सीखना भारत केलिए अच्छी खबर है

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रिफत जावेद 

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असम के गवर्नर और आरएसएस प्रचारक पी बी आचार्य ने शनिवार को एक घटिया बयान दिया जिसमे उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान सिर्फ हिन्दुओं का देश है । एक दिन बाद उन्होंने कहा कि मुसलमान चाहें तो पाकिस्तान और बांग्लादेश जाकर रह सकते हैं ।

अपेक्षानुसार आचार्य के इस सड़क छाप बयान की सोशल मीडिया पर जम कर भर्त्स्ना हुई और कुछ लोगों ने तो राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी से इस मामले में हस्तक्षेप की भी गुहार लगाई।

कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी को लंदन के वेम्ब्ली स्टेडियम से दिए गए भारत को विविधता में एकता का देश बताये जाने वाले भाषण में विरोधाभास की याद दिलाई ।

आचार्य का समाज में धर्म के नाम पर नफरत पैदा करने वाला यह बयान भाजपा द्वारा नियुक्त किसी गवर्नर की तरफ से पहला नहीं था। भाजपा और आर एस एस में उनके सहयोगी और इस समय त्रिपुरा के गवर्नर तथागत रॉय एक समुदाय विशेष के विरुद्ध ज़हरीले बयानों केलिए बहुत मशहूर हैं ।

अभी कुछ ही दिनों की बात है की रॉय ने गुजरात के मुस्लिम विरोधी दंगो को हुन्दुओं की बहादुरी बताया था। यह वह दंगा था जिसमें 1200 से भी ज़्यादा लोग मारे गए थे और उनमें अधिकतर लोग मुसलमान थे|

रॉय अपने घटिया और उकसाऊ बयान केलिए काफी बदनाम हैं और उन्हें अक्सर ट्विटर पर ऐसी भाषा का प्रयोग करते देखा जा सकता है जो गवर्नर का पद तो छोड़िये एक गंवार इंसान को भी शोभा नहीं देता ।

ऐसा लगता है कि मोदी ने नफरत फैलाने में उनकी इन्ही क़ाबलियत को देख कर इन राज्यों का गवर्नर नियुक्त किया था । शायद यही वजह है कि देश में असहनशीलता पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतनी थू थू के बावजूद प्रधानमन्त्री ने कभी भी अपने बेलगाम नेताओं को डाँट लगाना मुनासिब नहीं समझा ।

यह एक दुर्भाग्य है कि दिल्ली और बिहार में शर्मनाक हार के बावजूद भाजपा और मोदी को अब तक यह एहसास नहीं हुआ है कि नफरतों की राजनीति का अब भारत में कोई स्थान नहीं है ।

अंग्रेजी में एक बहुत ही मशहूर अभिव्तक्ति है, जिसे हम ‘Good Cop Bad Cop’ के नाम से जानते हैं । इसके तहत किसी भी संस्था या समुदाय में कुछ लोगों को ग़लत काम करने की पूरी छूट होती है और चूँकि वह समुदाय या संस्था सार्वजनिक रूप से कहीं बदनाम न हो इसकेलिए पहले से तय दुसरे सदस्य अच्छी अच्छी बातें करने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं ।

मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी इसी Good Cop Bad Cop की नीति पर बड़ी खूबी से काम किया है । यह वह सोची समझी नीति है जिसके अंतर्गत पार्टी के बेलगाम नेता जैसे आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, संगीत सोम, गिरिराज सिंह, रॉय और आचार्य को देश में प्यार और मोहब्बत का माहौल बिगाड़ने की पूरी छूट दी जाती है वहीँ अरुण जेटली, राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी जैसे नेता सब का साथ सब का विकास जैसे फ़र्ज़ी नारों के ज़रिये अपनी महानता दर्शाने की कोशिश करते हैं ।

जब देश की मीडिया अपनी जेब में हो तो फिर तमाम गुनाहों के बावजूद मोदी के बारे में सकारात्मक छवि वाली खबर दिखाना ज़्यादा मुश्किल नहीं होता है ।

अभी कुछ ही दिनों की बात है जब देश की मीडिया ने इस खबर को फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि किस तरह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी के बेलगाम नेताओं को दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय बुलाकर उनकी क्लास ली थी । ये अलग बात है कि उस मीटिंग के बाद बाहर निकलते ही साक्षी महाराज ने इन ख़बरों का न सिर्फ खंडन किया था बल्कि यह भी कहा कि वह कोई बच्चे नहीं हैं जिनका कोई क्लास ले सकता है ।

कोई माने या न माने, हकीकत यही है कि केंद्र की मोदी सरकार को अपने नेताओं द्वारा शिद्दत से फैलाई जा रही नफरत की राजनीति पर ज़र्रा बराबर भी अफ़सोस नहीं है । इस का सबसे बड़ा सबूत यह है कि इतना सब हो जाने के बाद भी मोदी ने आज तक कभी भी खुल कर इन नेताओं के बयानों की खुल कर निंदा नहीं की । बातों के धनि मोदी पर राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर जब दबाव बढ़ा, तो उन्होंने अपनी चुप्पी तो तोड़ी लेकिन वहां भी उन्होंने सिर्फ इशारों से बात करना ज़्यादा मुनासिब समझा ।

सितम्बर में दादरी हत्याकांड के बाद मैंने कहा था कि मोहम्मद अखलाक़ के हत्यारों को मोदी का मौन आशीर्वाद प्राप्त था, तथागत रॉय और पी बी आचार्य के ज़हरीले बयानों का जारी रहना मेरी उस दलील को सही साबित करता है ।

इस से एक बात शीशे की तरह साफ़ हो चुकी है कि बीजेपी ने अब तक बिहार और दिल्ली में मिली शर्मनाक हार से कुछ भी नहीं सीखा है ।

आचार्य के ताज़ा बयान से ये पता लग गया है कि बीजेपी अभी से ही असम चुनाव के लिए ज़मीन तैयार करने में जुट गई है । अगर पार्टी इस बार फिर असम में अपनी पुरानी सांप्रदायिकता की राजनीति और गैर अप्रवासियों के मुद्दों को हथिया कर कांग्रेस से आगे निकलने का सोच रही है तो बीजेपी तो पार्टी बिहार की तरह फिर से असमवासियों की समझ को काम आंकने की ग़लती कर रही है और बहुत मुमकिन है कि पार्टी को इस हरकत की एक मर्तबा फिर से भरी कीमत चुकानी पड़ सकती है

बिहार के चुनाव में पार्टी ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे झूठे नारे का राग अलापने की फिर से कोशिश की लेकिन खुद उनकी पार्टी के के अपने सर्वे ने ये दिखाया कि जनता ने बीजेपी के नारों को दरकिनार कर दिया है ।

यह साफ़ हो गया था कि 18 महीनों के शासन के बावजूद मोदी लोकसभा चुनाव में किये गए वादों को पूरा करने में नाकाम रहे थे और यही वजह थी कि वह जनता के सामने पूरी तरह बेनक़ाब हो गए ।

विकास के नाम पर वोट न मिलता देख कर पार्टी अपने पुराने हथकंडे अपनाने पर मजबूर हो गई जिसमें इस बार बीफ, पाकिस्तान और अल्पसंख्यकों के रिजर्वेशन का मुद्दा उठाया गया। अमित शाह का ‘पाकितान में पटाखें फूटेंगे’ वाला बयान एक जीता जागता उदहारण था । पार्टी ने चुनाव आयोग के चुनावी निर्देशों की धज्जियां उड़ाते हुए सांप्रदायिक रूप से असवेंदनशील विज्ञापनों को अख़बारों में छपवाया ।

लेकिन, बिहार की जनता ने बीजेपी को नीतीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन को शानदार जीत दिलायी और भाजपा को कड़ा सबक सिखाया। बीजेपी की हार से बिहार की जनता ने एक बात साफ़ कर दी है कि इस देश के हिन्दू आज भी सेक्युलर और सहिष्णु हैं और बीजेपी की घटिया राजनीति के शिकार नहीं बने हैं ।

बिहार के हाथ से जाने के बाद, ज़ाहिर है पार्टी ने अब बंगाल और असम पर अपनी नज़र टिका दी है । मैं आशा करता हूँ कि आचार्य और रॉय जैसे भाजपा के नेता एक समुदाय विशेष के विरुद्ध अपना ज़हरीला बयान देना और अहमक़ाना रवैय्या जारी रखें। पार्टी का बिहार और दिल्ली के चुनाव से भी सबक न लेना हिन्दुतान के लिए एक अच्छी ख़बर है । मुझे लगता है कि हिंदुत्व के इन तथाकथित संरक्षकों को अपना सब कुछ लुटाने के बाद ही यह एहसास होगा की 2015 के भारत में नफरत फैलाने और विविधता में एकता के मूल्यों को नुक्सान पहुंचाने वालों   केलिए कोई जगह नहीं है।

पिछले साल के लोकसभा चुनाव में जिन 30 प्रतिशत मतदाताओं ने मोदी को वोट दिया था वो उन्होंने हिंदुत्व के मुद्दे पर नहीं बल्कि मोदी की विकास के अजेंडे के झांसे में आकर दिया था। ज़ाहिर है इनमें से अधिकाँश लोग अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।  उन्हें 18 महीने के काम से पता लग चुका है कि अब मोदी के किसी भी बात, नारे और वादों के ऊपर विश्वास नहीं करना चाहिए ।

पिछले हफ्ते मैं अपने एक दोस्त से बात कर रहा था जो हरयाणा में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट पर मुख्यमंत्री एम एल खट्टर की मदद कर रहा है,
उन्होंने बताया कि करनाल शहर को पहले विकास किये जाने वाले 20 शहरों में शामिल किये जाने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं । उनकी बात सुनकर मैं हैरान था कि किस तरह मोदी के स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट ने स्थानीय लोगों में एक नया जोश भर दिया है । फिर भी ये प्रधानमंत्री का ध्यान विकास की मजबूत कथा के निर्माण पर भुनाने पर क्यों नहीं हैं ।

मोदी का आलोचक होने के बावजूद मैं स्मार्ट सिटी के प्रोजेक्ट से स्थानीय लोगों में पैदा होने वाले उत्साह से प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सका। काश मोदी जुमलों पर कम और उन चीज़ों पर ज़्यादा ध्यान देते जो उन्हें इतिहास में एक महान राजनेता का स्थान दे सकता था। दुर्भाग्यवश, उन्होंने अपने पास आए इतने खूबसूरत मौके को इतनी ख़ूबसूरती से गंवा दिया है ।

शायद मोदी को खुद येह एहसास नहीं है की उनकी नफरत की राजनीति ने खुद उनके ब्रांड को कितना नुकसान पहुँचाया है । सिर्फ 18 महीने पहले ऐसा लग रहा था कि मोदी को सिर्फ जीतना आता है और उनसे कोई ग़लती हो ही नहीं सकती है । लेकिन सिर्फ डेढ़ साल में वो देश के सबसे कम विश्वास किये जाने वाले नेताओं में से एक बन चुके हैं । इसकी अभियक्ति मोदी के पूर्व मित्र और सुप्रीम कोर्ट के वकील राम जेठमलानी ने काफी ख़ूबसूरती से यह कह कर किया कि ‘इतिहास में किसी भी नेता ने इतने कम समय में इतना सब कुछ नहीं खोया होगा।’

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