“जिन्दा कौमें पांच साल इन्तजार नही करती”

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संजय सिंह

26 जनवरी को भारत ने अपना 67वाँ गणतंत्र दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया और सरकारी स्कूलों से लेकर राजपथ तक को सजाया गया। बच्चों ने देशभक्ति के कार्यक्रम,नेताओं ने जोरदार भाषण और हमारी सेनाओं ने अपनी अदभुत सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया।

इस 67 साल के गणतंत्र में भारत ने बहुत से उतर चढ़ाव भी देखे। लोकतंत्र पर पहला बड़ा खतरा तब आया जब देश में आपातकाल लगाया गया,ऐसा लगा जैसे सबकुछ ख़तम हो गया, देश में तानाशाही आ गयी, लोकतंत्र का मायने ही समाप्त हो गया। लेकिन इस देश की जनता ने आपातकाल को समाप्त कराने के लिए व संविधान के मुताबिक देश की व्यवस्था चले इस उद्देश्य के लिए 1975 से 1977 तक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक लम्बा अहिंसक आन्दोलन चला कर आपातकाल की समाप्ति करायी। इससे फिर से एकबार लोकतंत्र की बहाली और जनता की जीत हुयी।

यहाँ यह याद रखने जरुरी है कि हमारे देश के संविधान ने जो अपना सेवक चुनने की शक्ति हमे प्रदान की है उसी शक्ति का प्रयोग करके 1977 में लोकतंत्र की जीत हुयी थी और देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और उनके पुत्र संजय गांधी को हार का सामना करना पड़ा था ,साथ ही ये भी याद रखना होगा की 1977 के अन्दोलम में गाँधी, लोहिया ,जयप्रकाश नारायण ,अम्बेडकर के रास्ते पर चलकर समाज के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर करने वाले कार्यकर्तायों और नेताओं की एक लम्बी फ़ौज थी | जो धीरे धीरे समय के साथ राजनीति से दूर होती गयी और राजनीति में लोकतंत्र को बदनाम करने के लिए लूटतंत्र ने अपनीं जगह बना ली |

लोकतंत्र को कई प्रकार की चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है, देश की राजनैतिक व्यवस्था में लोकतंत्र चार स्तंभों पर खड़ा है,विधायिका,कार्यपालिका,न्यायपालिका और पत्रकारिता।

अगर हम विधायिका की बात करे तो देश विधान बनाने वाली विधानसभाओं और लोकसभा में माफिया,अपराधी,भ्रष्टाचारी बहुमत में पहुँच गये हैं। इनके बीच चंद अच्छे लोग भी हैं जो या तो घुटन महसूस कर रहे हैं या फिर उनकी आवाज दबा दी जा रही है।

एक अख़बार के मुताबिक 30 प्रतिशत सांसदों और विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं और इन्ही माननीयों के दम पर देश चल रहा है।

कार्यपालिका की बात करें तो चपरासी से लेकर आईएएस तक करोड़ों, अरबों का भ्रष्टाचार कर रहे हैं, मध्य प्रदेश में तो चपरासी के घर से भी करोडो रूपये की बरमदगी का मामला सामने आया था और यही हाल पूरे देश का है।

न्यायपालिका की तरफ हम देखते हैं तो पता चलता है कि देश भर में अभी भी तीन करोड़ से ज्यादा मामले न्यायालयों में विचाराधीन है। अपरधियों को सजा सुनाये जाने का अनुपात बहुत कम है, खुलेआम केस के मुताबिक जमानत कराने की डील होती है। माननीय न्यायाधीशों ने भी अकूत सम्पति अर्जित की है जिसकी जांच कराने का साहस शायद ही कोई कर सके।

“न्याय चला निर्धन से मिलने“ का नारा सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन क्या हमारी न्याय व्यवस्था में गावं का गरीब किसान सुप्रीम कोर्ट जाकर अपने मामले की पैरवी करने की क्षमता रखता है? क्या वह वकीलों की लाखों लाख की फीस दे सकता है?

अब बात करते हैं लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की, कलम के सिपाहियों की यानि पत्रकारिता की। पत्रकारिता के ऊपर इन तीनो स्तंभों पर पैनी निगाह रखने और उनके सच को जनता के बीच उजागर करने की जिम्मेदारी थी लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में आई गिरावट। लोकतंत्र के बाकि तीनो स्तंभों को लूट की खुली छुट प्रदान करने में मददगार साबित हो रही है।

हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि पत्रकारिता जगत में आज भी ईमानदार पत्रकारों की बड़ी तादाद है, उन्होंने समय समय पर राजनीति के भ्रष्टाचार और अपराध को बड़े पैमाने पर उजागर किया है। अपने कलम के जरिये उन्होंने आवाज भी उठाई है लेकिन उनकी क्षमता बहुत सीमित है क्योकि आज मीडिया समूहों पर उद्योगपतियों, नेताओं का कब्ज़ा है। यह सर्वविदित तथ्य है की मीडिया समूह अलग-अलग दलों के लाउडस्पीकर,प्रचारक या फिर समर्थक का कार्य कर रहे हैं।

लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों में गिरावट के साथ ही दो और बड़े प्रभावशाली क्षेत्र हैं जो हमारे समाज पर गहरा असर डालते हैं। एक है धार्मिक संस्थाएं और दूसरा सामाजिक संस्थाएं। धार्मिक संस्थायों के नाम पर पूरे देश में लूट और ठगी का धंधा जारी है। बाबाओं का बाजार गर्म है और बाबा-बाजार के नाम पर देश की जनता से करोडो की उगाही जारी है।

यही हाल सामाजिक संस्थाओं का है। एनजीओ बनाकर दलितों,पिछडो,आदिवासियों,महिलाओं,अल्पसंख्यकों के उत्थान का दावा करने वाले एनजीओ भी भ्रष्टाचार का अड्डा बन गये हैं, बड़ी बड़ी योजनाओं के नाम पर सरकारी धन की लूट कर रहे हैं।

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि उपरोक्त सभी क्षेत्रों कार्यपालिका,विधायिका,न्यायपालिका, पत्रकारिता एवं धार्मिक तथा सामाजिक संस्थाओं में अच्छे,ईमानदार और निष्ठावान लोग नहीं हैं लेकिन बुरे लोगों का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है और इन संस्थाओं की विश्वसनीयता घटती जा रही है।

इसी वजह से महंगाई,भ्रष्टाचार,गरीबी,बेरोजगारी,किसानों की आत्महत्या,महिलाओं का शोषण,उद्योग जगत की लूट जैसे संकट से देश का 70 साल का लोकतंत्र और 67 साल का गणतंत्र जूझ रहा है।

इन सबके बीच उम्मीद सिर्फ देश के आम लोगों से है,देश की जनता से है। वही बदलाव के सच्चे वाहक हैं। इस देश की जनता ने ही देश को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आज़ाद कराया। 1977 में आपातकाल से मुक्ति दिलाई और 1989 में कांग्रेस की प्रचंड बहुमत की सरकार को बोफोर्स के भ्रष्टाचार के कारण उखाड़ कर फेक दिया। 2011 में लाखों करोड़ के टुजी,कामनवेल्थ और कोयला घोटाले के खिलाफ अन्ना आन्दोलन में देश लामबंद हुआ और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।

उपरोक्त सभी घटनायों से साफ़ हो जाता है की जब-जब हमारे लोकतंत्र और गणतंत्र को कमजोर करने की कोशिश की जाएगी,लूटतंत्र,धनतंत्र,भ्रष्ट तंत्र,अपराधतंत्र,जातितंत्र, धर्मतंत्र,परिवारतंत्र को मजबूत किया जायेगा उसे बचाने का काम देश का आम आदमी ही करेगा।

देश के विकास के लिए सबसे बड़ी ताकत है आम आदमी। आम आदमी के लिए डॉक्टर लोहिया का एक कथन जरुर याद दिलाना चाहूँगा कि “जिन्दा कौमें पांच साल इन्तजार नही करती”।

देश का आम आदमी ही देश का सच्चा मालिक है, वही है जो सरकार बनाता है,वही है जो सरकार गिराता है,वही है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करता है, वही है जो सडकों पर लाठियां खाता है,जेल जाता है, वही है जो तमाम तकलीफें सहने के बावजूद भारत माता की जय के नारे का उदघोष करता है। देश की उम्मीद की एक ही किरण है आम आदमी।

संजय सिंह आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता, प्रवक्ता,और पंजाव,हिमांचल और उत्तर प्रदेश के प्रभारी हैं।

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