हमारी संकीर्ण मानसिकता: ऐसा क्यों है कि अगर कोई मुस्लिम है तो वो कट्टर ही होगा और साफ़-सफाई करने वाला चमार ही होगा

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प्रीति महावर, लुधियाना

इंसान का एक ही धर्म और देश होता है वो है उसकी इंसानियत। लेकिन जिस तरह से भारत में क्षेत्रवाद और ज़ात पात के प्रति झुकाव काम होने की बजाये बढ़ रहा है, लोग एक दुसरे की जड़े काटने में लगे हैं, उसे देख कर यही कहा जा सकता है की भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आने में अब भी कई साल बाकी हैं। इतिहास गवाह है इस बात का कि विदेशियों ने फूट डालो राज करो की नीति के बल पर पूरे भारत को अपने अधीन कर लिया।

ऐसा नहीं है की आज स्थिति पहले की ही तरह ही है। आज धर्म के नाम पर लड़ने वाले कम, क्षेत्र के नाम पर लड़ने वाले ज्यादा हैं। अगर कोई मजदूर है तो वो यूपी-बिहार का ही होगा और उसे भईय्या या भईय्यारानी ही कहा जाना चाहिए, अगर कोई पंजाबी है तो वो पेंडू और गालियों की दूकान होगा, अगर कोई कंजूस और जुगाडू है तो वो मारवाड़ी ही होगा, अगर कोई मुस्लिम है तो वो कट्टर ही होगा, साफ़-सफाई करने वाला चमार ही होगा, अगर कोई काला है तो वो साउथ इंडियन होगा।

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यह कुछ ऐसी बातें है जो अधिकतर भारतीयों की छोटी मानसिकता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। ये और कुछ नहीं बस हमारी संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है| ऐसा नहीं है की इन बातों को बोलने वाले पढ़े-लिखे नहीं होते। इनमे ज़्यादातर पढ़े-लिखे लोग ही होते हैं और हैरत तो तब होती है जब युवा भी इस तरह के काम कर रहे हों। देश में एकता तभी ही संभव है जब हम सभी जाती, धर्म, रंग, वर्ण, कर्म आदि की राजनीति से उपर उठ कर अपने, अपने परिवार, समाज, देश, दुनिया या यूँ कहे इंसानियत के लिए सोचेंगे। भारत के हर नागरिक के पास समानता का अधिकार है और इसका हनन करने पर कठोर सजा का भी प्रावधान है। लेकिन भारत में आज भी ज़्यादातर लोग क्षेत्रीयतावाद, जातिवाद, धर्मवाद आदि की राजनीति करते हैं।

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यह गिरी हुई मानसिकता हमारे देश के लिए एक श्राप है। इसे मिटाने के लिए लोगों को अपने घर से ही शुरुआत करनी होगी। अगर माँ-बाप अपने बच्चों को इन बुराइयों से दूर रखते हुए सबके साथ पूरे तन, मन, धन से मिलकर आगे बढ़ने की सीख दें, सभी शिक्षण संस्थान बिना किसी भाषा, धर्म, ज़ात-पात का भेद किये बिना बच्चों को शिक्षा दें, सरकार अपनी क्षेत्रीयतावाद, धर्मवाद, जातिवाद आदि की राजनीति से ऊपर उठ कर देश हित में कार्य करें तभी यह श्राप भारत से मिट सकेगा।

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देश को विकसित करने के लिए क्रांति की ज़रूरत होती है और ऐसा तभी होगा जब आज से नहीं बल्कि हम अभी से भेद-भाव की
भावना को खुद से दूर कर वसुधैव कुटुम्बकम को अपनाए।

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