दादरी का सच, गौरक्षा या फिर सामाजिक दिखावा ?

0

ऋचा वार्ष्णेय

एक सवाल जो मेरे ज़हन में गूँज रहा है कि जो दादरी में हुआ था वो गाय के जीवन के लिए था या सामाजिक दिखावे के लिए ?

क्यूंकि अगर गाय बचाना मकसद था तो 2008  में जब पहली बार गाय के मांस का निर्यात हुआ तो रोका क्यों नही गया और ऐसा नही कि सरकार बदलने के बाद कोई भी परिवर्तन आया बल्कि भारत आज भी गौ, भैंस और बैल के मांस निर्यात में विश्व में नंबर एक पर ही है मतलब साफ़ है गाय बचाना मकसद नही है वर्ना सबसे पहले सरकार से मांग की जाती कि देश के सारे बूचड़ खानो को बंद किया जाए और गौ हत्या पर सख्त कानून लाया जाये ..क्या ऐसा कुछ हुआ ?

बल्कि खुद ही हमने जोश में आकर बिना जाने एक व्यक्ति की जान ले ली जिसने अपने बेटे को भारत माता की सेवा में लगाया था। ऐसा बदला दिया हमने उसको उसकी देश भक्ति का और उस पर वो वीर पुत्र कहता है सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा ..

चलिए अब बात आती है गौ सम्मान पर..हिन्दू धर्म के अनुसार गाय को माता के रूप में देखा जाता है और करोडो देवी देवताओ का वास भी कहा जाता है तो फिर क्यों हम चमड़े से बनी बस्तुओं का प्रयोग अपने दैनिक जीवन में करते हैं ?

आप सभी को ज्ञात होगा कि चमड़े का निर्माण चमड़ी अर्थात खाल से होता है वह गाय भैंस कुत्ते बिल्ली किसी की भी हो सकती है तो सर्वप्रथम हमे चमड़े से बनी वस्तुओं को निष्काषित करना चाहिए और इसके अलावा क्या किसी ने देश में गाय की हालत देखी है जिस गाय को पूजना चाहिए ..सर्वप्रथम रोटी को भोग जिसको लगाना चाहिए वो आज इस भारत वर्ष में कूड़े मलवे में प्लास्टिक खा कर जीवन यापन कर रही हैं और हम उनके लिए कुछ न करके दूसरे लोगो को जीवन समाप्त कर रहे हैं  क्या  हम आपस में लड़ कर देश को प्रगति के शिखर पर ले जा सकते हैं

क्या जातिवाद की लड़ाई देश की भूखमरी अशिक्षा, बेरोज़गारी ,महँगाई और अन्य समस्याओ का समाधान कर सकती है? क्या कोई भी घर आपस में लड़कर घर को मज़बूत बना पायेगा कभी..हम एकता की शक्ति की कहानी बच्चों को सिखाते हैं काश हमने खुद इस शक्ति  के होने का अहसास किया होता..

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here