क्यों मनाना चाहिए हमें 26 जनवरी?

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अमित भास्कर 

भारत के संविधान की आजकल चर्चा तभी होती है जब कोई कथित असंवैधानिक बयान सामने आता है । आजकल असंवैधानिक होना ही इतना संवैधानिक हो गया है की आप रोज टीवी डिबेट देख के घबरा से जाते हैं कि बचपन से जिसे किताबों में पढ़ा, जिसका गुणगान हर 26 जनवरी को किया वो सब कहीं गलत तो नही हो गया।

कभी बाबा साहब की नियत पे सवाल उठा दिए जाते हैं तो कभी संविधान की धाराओं को बकवास बताया जाता है, और ये सब तो कुछ नही आप में से कुछ युवाओं ने वयवस्था से तंग आकर ये लाइन न जाने कितनी बार बोली होगी ‘ यार ये न अंग्रेजों का संविधान है, फिर से लिखना चाहिए ‘।

हालाँकि ऐसा हम जानबूझ गुस्सा निकालने के लिए कहते हैं लेकिन एक सत्य और भी है कि आप में से हर शख्स न तो संविधान को अच्छे से पढ़ता है और न ही उसके पीछे के इतिहास को अच्छे से जानता है। जरूरत भी नहीं है । हर साल 26 जनवरी पर हम सलामी तो दे ही देते हैं, परेड देख लेते हैं और क्या हाँ वो देशभक्ति वाला गाना सुन लेते हैं ।

बस अपना काम हो गया । कभी कोशिश कर के देखेंगे संविधान को जानने की तो आपको सच में लगेगा की देश संवैधानिक तरीके से कम, असंवैधानिक तरीके से ज्यादा चल रहा है। या क्या पता उल्टा भी लग जाए। चलिए अब आप सोच रहे होंगे की इतनी बड़ी बड़ी डींगे मारने से अच्छा कुछ बता ही दिए होते तो लीजिये जान लीजिये भारतीय संविधान के बारे में कुछ रोचक बातें :

  • भारतीय संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखा गया संविधान है जिसमें 448 अनुच्छेद हैं .
  • 29 अगस्त 1947 को संविधान के निर्माण के लिए समिति का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर बनें .
  • ड्राफ्टिंग समिति ने पूरे संविधान को हाथों से लिखा था, इसमें किसी तरह की प्रिंटिंग की मदद नहीं ली गयी थी .
  • जिस दिन संविधान पर हस्ताक्षर किये गये उस दिन बाहर बारिश हो रही थी जिसे एक अच्छे शगुन के तौर पर देखा गया .
  • संविधान को असेंबली में पेश होने के बाद करीब 2 साल 11 महीने और 17 दिन के बाद संविधान को लागू किया गया
  • 24 जनवरी 1950 को असेंबली के 284 सदस्यों ने इस संविधान पर अपने हस्ताक्षर किये .
  • 26 जनवरी 1950 को ही भारत सरकार ने शेर के साथ अशोक चक्र को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया
  • भारतीय संविधान बनने से पहले भारत में ब्रिटिश सरकार का गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1935 लागू था .
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अब इतनी जानकारी से आप संविधान की जानकारी में पारंगत तो नही हो जाएंगे लेकिन हाँ कम से कम अगली बार ये नही कहेंगे की संविधान बदल दो। भाई मज़ाक नहीं है न इतनी मेहनत से नियम बने हैं पहले उनका पालन तो कर लें की दिनों दिन नियम ही बदलते रहेंगे ?

अच्छा अब आप सब जानते ही हैं कि चूँकि 26 जनवरी का दिन क़रीब आते ही देश में सुरक्षा चुस्त कर दी जाती है तो ये तै है कि आप अपने ही देश के कुछ स्मारकों को अब 29 तारीख तक नहीं देख पाएंगे । इस बार 26 तारीख मंगलवार को है तो आपने सोमवार की छुट्टी लेके शुक्रवार से मंगलवार यानी एक दिन के छुट्टी को 5 दिन में बदल देने का प्लान बना लिया होगा ।

कहाँ जाएंगे, क्या खाएंगे, कौन सी फ़िल्म देखेंगे, अच्छा अभी कौन सी रिलीज़ हुई है वो … वगेरा वगेरा । ये है आज का गणतंत्र दिवस, 21वीं सदी का ।
26 जनवरी को सुरक्षा इतनी जबरदस्त होती है कि क्या बताएं, दिल्ली में रहते हैं तो आपको पता ही होगा, 10 दिन पहले से न आप इंडिया गेट जा पाएंगे और न लाल किला, न क़ुतुब कहीं नही । देश भर के लोग गणतंत्र दिवस का परेड देखने न जाने कहाँ कहाँ से दिल्ली तक आते हैं । कई लोग जानकारी के अभाव में पुरे डिजिटल कैमरे, और न जान क्या क्या लेके आते हैं, सबको चाह होती है की भव्य प्रदर्शनी की एक झलक फ़ोन में या कैमर में कैद करके वापस अपने घर ले जाएँ ।

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लेकिन सुरक्षा के नाम पर न कोई कैमरा आप ले जा सकते हैं और न फ़ोन । ऐसे में कई लोग तो वापस भेज दिए जाते हैं और उनके लिए गणतंत्र दिवस की सारी महिमा वहीं खत्म हो जाती है । अब क्या करियेगा 60 साल पार हो गया कबका लेकिन फ़ोन तक से सुरक्षा को खतरा हो तो कोई क्या समझे वो भी उस परेड में जिसमे देश के आधुनिकतम आविष्कार और हथियारों की प्रदर्शनी से हम सब फूले न समाते हों । तो इस बार अगर प्लान बना रहे हैं तो सोच समझ के बनाइएगा ।

जो लोग कई बार परेड देखने जाते हैं वो कहते हैं की यार इतने साल से कोई तरक्की ही नही हुई वही मिसाइल, वही टैंक बदला क्या । तभी पीछे से आवाज़ आती है शहीदों को सम्मानित किया जा रहा है । तो आपको भी समझ आ जाता है की क्या बदला, हर साल हमारे रक्षा में शहीद हो जाने वाले जवानों की तादाद बदलती रहती है, और उसपर राजनीती भी । बहुत कुछ बदलता है आपके कुछ न बदलने की सोच के पीछे ।

राजपथ बहुत दूर तक फैला है इस छोर से लोग अक्सर नृत्य करने की टोलियों को जाता देखते हैं लेकिन वो नृत्य दुसरे छोर पर देश के महामहिम के सामने हो रहा होता है। आज तक किसी ने ये जरूरी नही समझा की बाकि बैठे लोग भी हिन्दुस्तानी ही हैं उनके लिए ज्यादा नहीं तो एल.ई.डी स्क्रीन ही लगवा देते ।

जिस राज्य की झांकी निकलती है उस राज्य के लोग सिटी बजा के सबको बता देना चाहते हैं की देखो भैया ये हमारे लोग हैं, हमारे । इसमें ख़ुशी की बात ये होती है की नार्थ ईस्ट की झांकी भी लोग देख लेते हैं और जान लेते हैं की ये भी हमारे हैं भले टीवी के न्यूज़ वगेरा में ये गायब क्यों न हों ।

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परेड के आखिर में सबसे जबरदस्त 2 कारनामे होते हैं जिसमे सबसे ज्यादा सीटियां बजती है और वो है मोटरसाइकिल स्टंट, और जहाजों का करतब । जहाजों को आधे लोग तो पता ही नहीं कर पाते हैं की कहाँ से आया और कहाँ गया ।

लोग आवाज़ के पीछे आँखें भगाते रहते हैं लेकिन… खैर छोड़िये आप गए होंगे तो आपको तो पता ही होगा । टीवी पे देखने वाले चौड़े हो रहे होते हैं की हमें तो दिख गया वो गया एक जेट ।
गणतंत्र दिवस का परेड पहली बार 1950 में मनाया गया । इस परेड के बारे में ये कुछ रोचक तथ्य जान लें :
• गणतंत्र दिवस का उत्सव 3 दिनों तक चलता है. आखिरी दिन यानी 29 जनवरी की शाम को राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी के साथ गणतंत्र दिवस का समापन किया जाता है .
• सेना में बैंड की शुरुवात 1950 में मेजर रोबर्ट्स ने की थी . उस दिन से आज तक ये परंपरा चली आ रही है .
• परेड को देखने के लिए हर साल एक नए मुख्य अतिथि होते हैं . ये मुख्य अतिथि किसी भी दूसरे देश के प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति होते हैं .
• इस साल गणतंत्र दिवस के परेड में मुख्य अतिथि फ्रांस के राष्ट्रपति फ़्रन्कोइस होल्लान्दे हैं
• 2015 में पहली बार सेना के तीनों अंगों से महिला सैनिकों ने परेड किया
• 2015 में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मुख्य अतिथि बनें
• 2015 में ही पहली बार राष्ट्रपति ओबामा और भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अलग-अलग गाड़िओं में परेड स्थल पर पहुंचे . अमूमन मुख्य अतिथि भारत के राष्ट्रपति के साथ उनकी ही गाड़ी में परेड स्थल तक जाते हैं .
• परेड के लिए टिकट की बिक्री महीने भर पहले से शुरू हो जाती है
• सुरक्षा के लिए इंडिया गेट को 1 महीने पहले ही बंद कर दिया जाता है .

अमित भास्कर एक पत्रकार है

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